ढाल

बढता नाविक
क्षितिज के पार
समुद्र की लहरें विशाल
कलम जिसकी ताकत
मानस की प्रतिबद्धता
है उसकी ढाल.

संजीव तिवारी

अदा के लिये

सांसे जब तक धडकती रहे,
नब्जो मे हो जब तक स्पन्दन,
तुमको कलम और आवाजो को
थामना ही होगा.
कैसे तुम कह सकती हो
शव्दो को अलविदा.

संजीव तिवारी
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मानव 2

अपने भीतर के कल्‍मष को
अब तक मनुज नहीं धो पाया
अपने व्‍यवहारों को उसने
नया मुखौटा है पहनाया
पाषाणी मानव के भीतर,
अपनापन कुंटित प्रतिपल है.

विद्या भूषण मिश्र 
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सह + मत

पडी लकीर रेत पर जैसी
आज हुई गति नैतिकता की
भीडतंत्र के संकल्‍पों में
डूब गई मति मानवता की.

 विद्या भूषण मिश्र
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आदमी

आज खुशामदखोर अहं के गरल उगलते हैं
करते हैं बाहर से सौदा भीतर बिकते हैं
रिश्ते नाते हुए खोखले मुंह देखा व्यवहार
उल्लू सीधा करने वालों की है आज कतार
पल-पल डींग हॉंकते अपना यश दुहराते हैं
चमचे स्वारथ के रस पीने शीश झुकाते हैं
किन्तु असंभव है खोटे सिक्कों का चल पाना
सबसे कठिन आदमी को है, आज समझ पाना.

विद्या भूषण मिश्र

संगी-साथी

ब्‍लॉगर संगी