इंदिरा के योग गुरू से लेकर एक ‘ताकतवर हस्ती’ तक बड़े-बड़े चाहते थे स्टील की हेराफेरी

सेल के पूर्व चेयरमैन की किताब से सनसनी

मोहम्मद जाकिर हुसैन

 स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के पूर्व चेयरमैन डॉ. प्रभुलाल अग्रवाल की हालिया रिलीज किताब ‘जर्नी ऑफ ए स्टील मैन’ इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। ‘सेल’ की तमाम ईकाईयों मे इस किताब का अंग्रेजी संस्करण पहुंच चुका है और अफसर उस दौर के इस्पात जगत से जुड़े षडय़ंत्र और दूसरे किस्सों को बेहद उत्‍सुकता के साथ पढ़ रहे हैं। डॉ. अग्रवाल की इस किताब का हिंदी संस्करण भी अगले माह आ रहा है। इन दिनों उदयपुर में रह रहे डॉ. अग्रवाल ने ‘छत्‍तीसगढ़’ से फोन पर चर्चा में कहा कि किताब में उन्‍होंने वही सब कुछ लिखा है जिनसे उनका सीधा वास्ता रहा। डॉ. अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी व्यक्ति विशेष की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं है, लेकिन जो वास्तविकता है उसे समाज के बीच लाने में वह कोई बुराई नहीं समझते।

राउरकेला स्टील प्‍लांट (आरएसपी) के पूर्व प्रमुख डॉ. अग्रवाल जनता शासनकाल से लेकर इंदिरा शासनकाल के शुरूआती दिनों (1980)तक ‘सेल’ के चेयरमैन रह चुके हैं। डॉ. अग्रवाल ने आत्‍मकथात्‍मक शैली में लिखी इस पुस्तक में अपने पूरे कैरियर का खाका खींचा है, साथ ही कुछ ऐसी घटनाओं का ब्‍यौरा दिया है,जिनसे उस दौर की तस्वीर का दूसरा पहलू भी उभरता है। आरएसपी में जनरल मैनेजर रहने के दौरान उड़ीसा की तत्‍कालीन मुख्यमंत्री और उनके भाई से हुए विवादों का जिक्र करते हुए डॉ. अग्रवाल ने लिखा है कि मुख्यमंत्री नंदिनी सत्‍पथी के भाई तुषार पाणिग्रही उनसे मिलने आए और संयंत्र भ्रमण के बाद सीधे तौर पर 5 एमएम मानक वाली 110 टन स्टील प्‍लेट की मांग कर दी। असमर्थता जताने पर श्री पाणिग्रही नाराज होकर चले गए और बाद में संभवत:यह बात अपनी बहन (मुख्यमंत्री)को भी बताई होगी। इसके बाद जब श्रीमती सत्‍पथी राउरकेला दौरे पर आई तो उन्‍होंने मुझे अकेले में ले जाकर कहा कि-मैं तुम्हें उड़ीसा से बाहर करवा दूंगी, क्‍योंकि मेरे अपने लोगों के लिए तुम कुछ भी नहीं कर सकते हो। मैंने उन्‍हें बेहद विनम्रता से जवाब दिया कि मैडम, यह आपकी इच्‍छा है, अगर मुझे राउरकेला से बाहर भी पोस्टिंग मिलती है तो मैं वहां जा कर काम करने में खुशी महसूस करूंगा।

डॉ. अग्रवाल के मुताबिक इस प्रकरण के बाद उड़ीसा स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड से आरएसपी को बिजली आपूर्ति के मुद्दे पर गतिरोध उत्‍पन्‍न हो गया। उड़ीसा बिजली बोर्ड हमें हमारे हिस्से की बिजली देने मे कोताही बरतने लगा। इससे प्‍लांट का उत्‍पादन प्रभावित हो रहा था। इस बारे में जब मैंने अपने लोगों से पता करवाया तो मालूम हुआ कि यह आदेश ‘ऊपर’ से था, जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि आरएसपी मैनेजमेंट को ‘सबक’ सिखाना जरूरी है।

मैंने वस्तुस्थिति की रिपोर्ट बनवाई और अपने मंत्री चंद्रजीत यादव को रूबरू कराया। श्री यादव इस फाइल को लेकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिले। अगले दिन श्रीमती सत्‍पथी नई दिल्ली आने वाली थी। ऐसे में बाद में मुझे श्री यादव ने बताया कि श्रीमती गांधी ने मुख्यमंत्री को बेहद कड़े शब्‍दों में चेताया था। इसका असर यह रहा कि उड़ीसा विद्युत मंडल से राउरकेला स्टील प्‍लांट को बिजली की आपूर्ति नियमित हो गई। इंदिरा शासनकाल में पडऩे वाले दबाव का जिक्र करते हुए डॉ. अग्रवाल ने अपनी किताब में बहुत से खुलासे किए हैं।

डॉ. अग्रवाल ने लिखा है कि इंदिरा गांधी के बहुचर्चित योग गुरू(जिनका नाम उन्‍होंने नहीं दिया है) का एक पत्र मिला, जिसमें उन्‍होंने कुछ हजार टन स्टेनलेस स्टील (फ्लैट) लगभग आधी कीमत पर ‘सेल’ से खरीद कर इंपोर्ट करने मांग की थी। स्टील के कंट्रोल के दौर में इस योग गुरू का आवेदन मैंने रद्द कर दिया। इसके कुछ दिन बाद इस योग गुरू का एक और पत्र मुझे मिला जिसमें 5 एमएम मानक के 12000 टन स्टील प्‍लेट की मांग की गई थी। अपने पत्र में इस गुरू ने यह यह उल्लेख किया था कि उन्‍हें इस स्टील प्‍लेट की जरूरत हिमाचल प्रदेश में अपने छोटे से एयरक्राफ्ट का फ्यूल टैंक बनाने के लिए है। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक इस बारे में जब मैंने इंडियन आइल कार्पोरेशन के चेयरमैन चिंतादास गुप्‍ता से सलाह ली तो उन्‍होंने योग गुरू का नाम सुनते ही कह दिया कि मुसीबत में पढऩे के बजाए वो जितना मांगते हैं उन्‍हें उतना स्टील दे दो। हालांकि दासगुप्‍ता ने मुझे बताया कि बीचक्राफ्ट एयरप्‍लेन में फ्यूल टैंक के लिए मुश्किल से दो सौ टन स्टील लगेगा न कि 12 हजार टन। मैंने योग गुरू की दरख्वास्त इस्पात मंत्री प्रणव मुखर्जी तक पहुंचाई तो उन्‍होंने मुझे योग गुरू से इंजीनियरिंग ड्राइंग मंगवा लेने कहा। इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ दिन बाद योग गुरू की तरफ से चिट्ठी आई कि अब उन्‍हें इस स्टील की जरूरत नहीं है। 

इंदिरा राज की सबसे ‘ताकतवर हस्ती’ के प्रभाव का जिक्र करते हुए डॉ. अग्रवाल ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि ‘सेल’ चेयरमैन रहने के दौरान मुझ पर स्टील लॉबी का दबाव था कि स्टील की मांग के जितने पुराने प्रस्ताव हैं, उन्‍हें फिर से खोला जाए। इसके लिए स्टील लॉबी से जुड़े लोग इंदिरा शासन काल की सबसे ‘युवा ताकतवर राजनीतिक हस्ती’(इनका नाम उन्‍होंने नहीं दिया)के पास पहुंचे। इस ‘हस्ती’ ने मेरे पास अपना एक प्रतिनिधि भेजा। यह सारे प्रस्ताव काफी पुराने थे और अगर मैं इन्‍हें मान लेता तो संभव था कि ‘सेल’ को बहुत बड़ा घाटा उठाना पड़ता। इसलिए मैंने सारे प्रस्तावों को बेहद गंभीरता के साथ परीक्षण करवाया। इससे होने वाले नुकसान को देखते हुए मैंने सारे प्रस्ताव पर अमल रोकना बेहतर समझा। लेकिन,स्टील लॉबी इससे संतुष्ट नहीं थी। ऐसे में मैंने उन लोगों को सलाह दी कि यदि मेरे मंत्री मुझे लिखित में निर्देशित कर दें तो मैं ऐसा कर दूंगा। ऐसे में उन लोगों ने फिर उस ‘हस्ती’ से गुहार लगाई। उस ‘हस्ती’ ने बेहद नाराजगी जताते हुए यह कहा कि किसमें इतना दम है जो मेरे निर्देश को दरकिनार कर मंत्री का लिखित मांगें। इसके बाद उस ‘हस्ती’ ने इस्पात मंत्री को बुलवा कर मुझे भेजने कहा। लेकिन मेरे मंत्री ने उन्‍हें सलाह दी कि यदि आप उन्‍हें अकेले बुलाकर मिलते हैं तो इसका गलत संदेश जाएगा। इसके बाद उस ‘हस्ती’ ने कहा कि-यदि ऐसा है तो उस चेयरमैन को बदल दो। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक इसके बाद इस्पात मंत्री ने मुझे बुलाया और कहा कि वह मेरे काम से खुश हैं लेकिन अब उपर (व्यक्ति विशेष)से कुछ दिक्‍कतें आ रही है। मैं उनकी बात समझ गया और अगल दिन मैंने 5 लाइन की चिट्ठी लिखी कि मेरी जितनी छुट्टी बकाया है उसे खर्च कर लेने दीजिए और उसके बाद मुझे पूरी छुट्टी दे दीजिए। इस तरह डॉ. अग्रवाल ने ‘सेल’ से अपनी विदा ली और बाद में इंडोनेशिया की एक स्टील परियोजना से जुड़ गए। वहीं बाद में डॉ. अग्रवाल ने भारत सरकार के सलाहकार के तौर पर भी सेवाएं दी और सर्वश्रेष्ठ एकीकृत इस्पात संयंत्र के लिए दिए जाने वाली प्रधानमंत्री ट्रॉफी की स्थापना में भी मुख्य भूमिका निभाई।

छत्‍तीसगढ़ से साभार

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