
'क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंच रचित यह अधम शरीरा ।' रमायेन के चउपाई ल सवाल बना के पूछे गीस उत्तर संस्कृत म मिलिस । का उत्तर दिस घनाराम भाई ह तउन ला कहूं आप मन जानत होहूं त बताहू ।

आज दूनों के समाज के नियम से बिहाव होगे ।
दूनों झन ला हमार अशीस ।
बने खावव, पहिनव अउ समाज में बगरे बिसराये लईक नियम मन के बिरोध खातिर कमर कस के अउ कछोरा भिर के आघू आवव, तभे तुंहर मान ह बने रहिही ।
नई तो चरदिनिया चंदैनी फुसक जही ।
ये संबंध म मेकराजाला म हमर छत्तीसगढ के बेटी माया ठाकुर ह घलोक अपन पतरा म लिखे हे एक नजर देख लेवव ।
(चित्र 'छत्तीसगढ से साभार)
बने कहेव भैय्या फ़ेर येमन जादा रमायण देख डारिन तइसने लागथे !चलो इही बहाना घुमका ला अउ अन्न्पुर्णा ला सरी दुनिया जान डरीस एखर ले जादा उपलब्धी त मोला एमा नइ दिखय !
ReplyDeleteसयम्बर कलजुग के सीता-राम .........
ReplyDeleteसंजीव भाई एकर पाछू कोनो उद्येश्य दिखे नहीं... सयम्बर कारिएया नोनी जरुर ड्रामा के पाछू के बात बर कुछु अंजोर कर सकत हे....! खईता कह लव..