समीक्छा : पिथमपुर के कलेसरनाथ

हमर छत्तीसगढ़िया लिखवइया म प्रोफेसर अश्विनी केसरवानी ह अलगे किसिम के लिखवइया हवय। ओ हर मर-खप गे हे ओमन ल खोज खोज के निकालथे अउ ओखर बारे म लिखथे। जुन्ना जुन्ना लिखइया कवि, सतजुगी-कलजुगी मंदिर-देवालय, हमर तिज-तिहार अउ का का ल बतांव, सब्बोच म लिख डारे हे। तिरेपन बच्छर पहिली महंत दयानंद भारती ह १९५३ म पिथमपुर के महत्तम ल संसकिरित म लिखे रहिस ओला खोज के निकाल डारिस अउ ओला 'पिथमपुर के कलेसरनाथ' (पीथमपुर के काले वरनाथ) नाम से बिलासपुर के बिलासा प्रकासन ह छापिस हे। पिथमपुर के महत्तम ल कोनो नइ जानय। ऐला बताय बर ये किताब हर बढ़िया हवय। अइसन बढ़िया काम करे बर ओखर बड़ई करे म बढ़िया लागत हे। भोला बबा ओला आसिरबाद अउ बरकत दिहि।

छत्तिसगढ़ प्रांत म घलो बड़कन जियोतिरलिंग जइसन काल ल जितवइया भोला बबा के मंदिर-देवालय हवय जेखर दरसन, पूजा-पाठ अउ अभिसेक करे म सब पाप धुल जाथे। अइसनहे एक ठन मंदिर जांजगीर-चापा जिला म हसदो नदिया के तिर म बसे पिथमपुर म हवय। महासिवरात्रि म अउ चइत परवा से अम्मावस तक १५ दिन इहां मेला भरथे अउ धूल पंचमी के दिन इहां भोला बबा के बरात लिकलथे जेला देखे बर देस भर के साधु मन इहां आथे। घिवरा के लिखवइया नरसिंगदास वैश्णव भोला बबा के बरात ल देख के गीत लिखे हे :-


आईगे बरात गांव तीर, भोला बाबा जी के

देखे जाबो चला गिंया, संगी ला जगावा रे।

डारो टोपी, मारो धोती, पांव पायजामा कसि,

गल गलाबंद अंग, कुरता लगावा रे।

हेरा पनही दौड़त बनही, कहे नरसिंहदास

एक बार हहा करही, सबे कहुं घिघियावा रे।।

कोऊ भूत चढ़े गदहा म, कोऊ कुकुर म चढ़े

कोऊ कोलिहा म चढ़ि चढ़ि आवत..।

कोऊ बिघवा म चढ़ि, कोऊ बछुवा म चढ़ि

कोऊ घुघुवा म चढ़ि हांकत उड़ावत।

सर्र सर्र सांप करे, गर्र गर्र बाघ करे

हांव हांव कु>ाा करे, कोलिहा हुवावत।

कहें नरसिंहदास, शंभु के बरात देखि,


जांजगीर के कवि सिरि तुलाराम गोपाल ह पिथमपुर ल सतजुगी गांव कथे अउ कुथुर-पामगढ़ के गीत लिखवइया सिरि बुटु सिंह चउहान ह कथे कि इहां पुन्नी म नहाय अउ पूजा-पाठ करे ले देवता धाम जाथे। ऐखरे बर इहां सब्बो झन आके नदिया म नहाके कलेसर भोला बबा के धूप, दिया जला के बेलपान, धतुरा, गांजा-भांग अउ फूलपान चढ़ाथे। अइसन करके मानता माने ले ओ हर पूरा हो जाथे फेर ओहर दूसर साल भूइयां नापत इहां आते अउ कलेसर भोला बबा के पूजा करथे। बहुत झन कथे-'इहां आय ले पेट पिरा ह थिरा जाथे।' काबर कि इहां के हिरासाय तेली के अइसनहे करे ले ओखर पेट पिरा थिरा गिस। गजट म उड़िया राज के खरियार के राजा ल इहां पेट पिरा ल थिराय बर आय रहिन करके लिख हे। ऐमा राजा के नाम नइ लिखे हे। लेकिन ये किताब म असवनी ह लिखे हवय कि ओला खरियार के युवराज जे. पी. सिंहदेव चिट्ठी लिखे हे कि हमर बबा राजा बिर बिक्रम सिंहदेव ह पेट पिरा के खातिर पिथमपुर नइ गे रहिस, ओ हर लइका के आसिरबाद मांगे गे रहिस। ऊहां कलेसर भोला बबा के पूजा करिन अउ मनौती मानिस कि ओखर लइका होही त इहां एक ठन मंदिर बनवाही। ओखर दू ठन नोनी अउ दू ठन बाबु होइस । ओ हर पिथमपुर म एक ठन मंदिर बनवाइस अउ देवता बइठाय नइ पाइस अउ मर गे त इहां के पुजारी मन ओ मंदिर म गौरी मइया ल बइठाइस। अइसनहे कतुक गोठ बात ल ए किताब म लिखे हवय। पिथमपुर के कलेसर बबा के महिमा ल कोनो नइ जानय। बुटु सिंह ओखर महिमा ल गाथे :-


हसदो नदिया के तिर म कलेसरनाथ भगवान।

दरसन जउन ओखर करिहि, आ बइकुंठ जाही।।

फागुन महिना के पुन्नी, जउन ऊंहा नहाइन।

कासी जइसन फल पाही, अइसनहे गाथे वेद अउ पुरान।।

बारहो महिना के पुन्नी म जउन इहां नहाहि।

ओ हर सीधा बइकुंठ जाही, अइसनहे गाथे बरनत सिंह चउहान।।


इहां के मंदिर के बनवइया के नाम पथरा म लिखाय हवय। कच्छ कुम्भारिया के जगमाल गांग जी ठिकेदार ह कारतिक सुदि दू, संबत् १७५५ म गोकुल मिसतिरि कर ए मंदिर ल बनवाय रहिस। मंदिर ह ओतका जुन्ना नइ लागय। अइसन लागथे ए मंदिर के साज-तुने के काम करा गे हे। चापा के लिखवइया छबिनाथ दूवेदी महराज ह ११० बच्छर पहिली संसकिरित भासा म 'कलेसर इस्तोत्र' लिखे रहिन जेमा ओ हर संबत १९४० म कलेसर बबा ह जनमिस अउ मंदिर ह चार बच्छर म (संबत १९४९ से संबत १९५३) म बनिस। पिथमपुर के हिरासाय तेली ल भोला बबा ह सपना दे के कहिन-'घुरूवा ले मोला निकालबे त तोर पेट के पिरा ह थिरा जाही।' हिरा ह ओसनहे करिस अउ ओखर पेट पिरा थिरा गे। ओहर इहां एक चउरा म भोला बबा के लिंग ल बइठाइस अउ पूजा करिस, सबके सामने म ओखर पेट के पिरा हर थिरा गे। ऐला सब्बो झन देखिन, दूरिहा गांव के लइकन-पिचकन, किसान, मोटियारी अउ माइ लोगन इहां आइन अउ पूजा करिन। फेर ऐला सब जान डारिस। चापा के जिमिदार हर ओखर भोगराग बर जोंगिस। इहां के मंदिर ल बनवाइन, ओमा संगमरमर लगवाइन अउ पूजा करे बर पुजारी रखिस। मेला अउ महासिवरात्रि म जिमिदार ऊंहा जाबेच करे। इहां एक ठन मठ रहिस हे जेखर महंत बैरागी मन रहिन। ए किताब म अस्सी बच्छर म दस झन महंत मन के नाम लिखे हे। ए किताब म अइसन अइसन गोठ-बात लिखे हे जेला बुढ़वा बबा मन तक नइ जानय। ए पाती ये किताब ह सहेज के रखे लाइक हे।


इहां के मेला म रंग रंग के दुकान, सिनेमा-सरकस, अउ झुला आथे। खाये-पिये के जिनिस, बरतन-भाड़ा, टिकली-चुनरी, सोना-चांदी, सिल-लोढ़ा अउ कपड़ा के दुकान आथे। मेला घुमे बर लइकन-पिचकन, किसान-किसानिन सब आथे। कभु कभु लइकन मन के बिहाव लग जाथे। अइसन दूसर जगह कहां होथे, सब भोला बबा के किरपा हे। हमर मन म पिरा होथे कि इहां आय के रद्दा हर बड़ खराब हे। गंगा जइसे हसदो नदिया के तिर म फैक्टरी लगे हे जेखर जहर से नदिया के पानी जहर जइसन हो गे हे। ऐला रोके बर लागही। हमर छत्तसगढ़िया सरकार ह पिथमपुर ल पर्यटन इस्थल बना देथिस त बढ़िया हो जाथिस। अइसहे लिखवइया जइसे हमरो कहना हे। किताब म मंदिर अउ देवता मन के बहुत बढ़िया फोटू छापे हे अउ ओर पचास रूपिया किमत जादा नइ हे। अइसहे अउ जगह मन के बारे म केसरवानी जी हर लिखही, भोला बबा ओला ऐखर बर आसिरबाद देवे।


कल्यानी केसरबानी

डागा कालोनी,

चांपा-४९५६७१ (छ.ग.)

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1 टिप्पणियाँ:

  1. छत्तीसगढ़ के गुर्तुर बोली म आपके विचार औ बोली के मिठास बहुत निक लगीस ,आपके सुघ्घर रचना सब्बो लिखैया मन बर प्रेरक औ रास्ता दिखैया रही ऐसन मोर सोच आवे अब आगे ले आप जानव

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