गुरतुर गोठ : छत्तीसगढी पाठक सुझाव देवें

छत्‍तीसगढ हा राज बनगे अउ हमर भाखा ला घलव मान मिलगे संगे संग हमर राज सरकार ह हमर भाखा के बढोतरी खातिर राज भाखा आयोग बना के बइठा दिस अउ हमर भाखा के उन्‍नति बर नवां रद्दा खोल दिस । अब आघू हमर भाखा हा विकास करही, येखर खातिर हम सब मन ला जुर मिल के प्रयास करे ल परही । भाखा के विकास से हमर छत्‍तीसगढी साहित्‍य, संस्‍कृति अउ लोककला के गियान ह बढही अउ सबे के मन म ‘अपन चेतना’ के जागरन होही । हमला ये बारे म गुने ला परही, काबर कि हम अपन भाखा के परयोग बर सुरू ले हीन भावना ला गठरी कस धरे हावन । हमला अपन भाखा बर हीन भावना ला छोड के अपन भाखा के परयोग जादा ले जादा करना हे । ये हा तभे हो पाही जब हम अपन साहित्‍य ला जादा ले जादा पढबो, अपन छत्‍तीसगढ के बारे म जानबो अउ हमर गांव गंवई ले जुडे रहिबोन । अइसे कर के हम सही मायने म अपन भाखा ल अउ अपन आप ला सम्‍मान दे पाबो । तभे ‘जय छत्‍तीसगढ’ के नारा ला अंतस ले पार सकबोन ।

छत्‍तीसगढ ला अपन भाखा म पढे बर हमर साहित्‍य भंडार ह भरपूर हे । फेर ये भंडार ह जन जन के पहुंच ले दूरिहा हावय । हम अपन भाखा के इही साहित्‍य भंडार के कुछ बूंद ला इंटरनेट के सहारा ‘गुरतुर गोठ’ म प्रस्‍तुत करना चाहत हन । इंटरनेट म छत्‍तीसगढी भाखा के विकास के संबंध म जब हम बात करथन त सबले पहिली जउन प्रस्‍न हमर आघू खडा होथे कि इंहां इंटरनेट के परयोग करईया कतका हे जउन येमा हमर भाखा के विकास के बारे म गुने जाय ? फेर जब आरकुट अउ दूसर चौपाल मन म छत्‍तीसगढ के संगी मन के दिनो दिन बढत संख्‍या ला नजर डारे ले पता चलथे कि इंटरनेट उपयोग करईया छत्‍तीसगढिया परेमी मन के कमी नई हे । ये चौपाल मन म चौपाल चलईया भाई मन के प्रयास से सबे छत्‍तीसगढिया मन ह अपन भाखा, साहित्‍य, संस्‍कृति अउ लोककला के बारे म सुघ्‍घर गोठ बात करत नजर आथे । हमला ये परेमी मन ला हमर भाखा अउ हमर प्रदेश के मान ला अइसनहे जनवाना हे अउ हमर छत्‍तीसगढ के मान ला बढाना हे ।

हमर ये प्रयास आप सब के सहयोग ले ही सफल हो पाही काबर कि विकास चाहे आदमी के होवय या समाज के, सब लोगन के आपस में जुर मिल के, सुंता ले, अपन अपन अनुभव अउ विचार ला एकदूसर ले बांटे ले ही धीरे धीरे संभव हो पाथे । हमर अकेला के सुन्‍दर ले सुन्‍दर सोंच, चिंतन कतको उंचा दरजा के काबर नई होवय, वो ह समाज के विकास बर रद्दा नइ गढ सकय । तेखर सेती ये जरूरी हे कि हम सबो मन जुर मिल के हमर भाखा, साहित्‍य अउ संस्‍कृति व लोककला के जानकारी बर सामूहिक चितन करन, कि अभी के समे में कोन कोन विसय ला ‘गुरतुर गोठ’ म नियमित प्रस्‍तुत करे जाय ।

हम ‘गुरतुर गोठ’ ला इंटरनेट पत्रिका जईसे प्रस्‍तुत करना चाहत हन, जउन ह हर पंद्रही म प्रकासित होही । अब येमा पहिली अंक देवी बैठका नवरात्री के दिन प्रस्‍तुत होही । जेमा छत्‍तीसगढी भाखा के 5 से 10 कविता/गीत, 1 कहिनी, 1 बियंग, 1 से 3 सामयिक लेख, 1 से 2 पुस्‍तक/पत्रिका/फिल्‍म/एलबम/सीडी समीछा, 1 काटून एक एक कर के एक दिन म या पांच दिन म प्रकासित होही । अंतरजाल जगत म उपस्थित जम्‍मे छत्‍तीसगढी रचनाकार ले हमर अनुरोध हे कि हमर संग जुरव अउ नियमित रूप से येमा लिख के छत्‍तीसगढ के मान बढावंव ।

गुरतुर गोठ

संत कवि पवन दीवान की हस्‍तलिखित कविता

भाई दीपक शर्मा जी हा पाछू महीना अपन गांव राजिम आये रहिस त छत्‍तीसगढ के जाने माने कवि संत पवन दीवान मेर आसिरबाद लेहे ल गे रिहिस । भाई के मया अउ परेम म संत कवि पवन दीवान जी हा तुरते अपन हाथ ले एकठन कबिता लिख के गुरतुर गोठ के असिरबाद बर दीस । ये कबिता ला हम आपमन के खातिर इंहा परस्‍तुत करत हन ।

दीपक भाई के बिदेस म रहि के देस के, माटी के मया अउ इज्‍जत ल हमर सलाम ।

Kavita

सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के

"गुरतुर गोठ" ला समर्पित एक ठन रचना......









सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के
अंधरा ला कह सूरदास अउ नाव सुघर धर कानी के




बिना दाम के अमरित कस ये
मधुरस भाखा पाए
दू आखर कभू हिरदे के
नई बोले गोठियाये


थोरको नई सोचे अतको के दू दिन के जिनगानी हे
सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के




एक आखर दुरपती के बौरब
जब्बर घात कराइस
पापी दुर्योधन जिद करके
महभारत सिरजाइस

रितवैया नई बाचिन कौरव कुल चुरवा भर पानी के
सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के




एईसनाहे एक आखर धोबी
भोरहा मा कहि डारिस
मूड के पथरा गोड़ में अड़हा
अलकरहा कच्चारिस

सुन के राम निकारिस सीता ल तुरते रजधानी ले
सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के




परके बुध परमती मा कैकयी
दू आखर बर मागिस
अवध राम बिन सुन्ना होगे
दशरथ परान तियागिस

महुरा हितवा नई होवे ना राजा ना रानी के
सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के




बसीकरण के मंतर मीठ भाखा मा
गजब समाये हे
चिरई चुरगुन सकल जनावर
मनखे तक भरमाये हे

कोयली अमरईया मा कुहके काउआ छानी छानी के
सबले गुरतुर गोठियाले तैं गोठ ला आनी बानी के



रचियता
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर

बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे





जइसन करम करबे फल वोइसनहे पाबे
बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे



लंद्फंदिहा लबरा झबरा के दिन थोरके होथे
पिरकी घलव चकावर करके मुड़ धर के रोथे
रेंगे रद्दा नरक के कैसे सरग हबराबे
बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे



दूसर बर खंचवा कोडवैया अपने गिर मरथे
चुरवा भर मा बुड्वैया ला कौन भला तिरथे
असल नक़ल सब परखत हे अउ कत्तेक भरमाबे
बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे



जनधन पद अउ मान बडाई पाके झन गरुवा
साधू कस परमारथ करके पोनी कस हरुआ
बर पीपर बन खड़े खजूर कस कब तक इतराबे
बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे



अंतस कलपाये ले ककरो पाप जबर परथे
हिन् दुबर दुखिया के सिरतो सांस अगिन झरथे
छानी ऊपर होरा झन भूंज जर बर खप जाबे
बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे



सब दिन सावन नई होवे नई होय रोज देवारी
सब दिन लांघन नई सोवे नई खावे रोज सोहारी
का सबर दिन रहिबे हरियर कभू तो अयिलाबे
बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे



सौंपत मा झूमे रहिथे बिपत मा दुरिहाथे
जियत कहिथे मोर मोर मरे मा तिरयाथे
ये दुनिया के रित एही काखर बर खिसियाबे
बोके बमुरी तैं चतुरा आमा कैसे खाबे



रचयिता
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर

छत्तीसगढ़िया



बायोडाटा

नाम : मनोहर दास मानिकपुरी
पिता : स्व. ननकी दास मानिकपुरी
शिक्षा : स्नातक
जन्मतिथि : 07-01-1959
जन्मस्थान : ग्राम - भुन्डा,जिला बिलासपुर (छ.ग.)
रूचि/विशेषता : छत्तीसगढ़ी गीतों एवं पारम्परिक
लोक गीतों का गायन
सम्मान : बिलासा कला मंच,सजातीय समाज,
स्वयं के संस्था(ग्रामीण बैंक) एवं अनेक
सांस्कृसतिक व साहित्यिक संस्था द्वारा सम्मान।
मंचन/प्रर्दशन : 1.आकाशवाणी एंव दूरर्दशन से
गीतों का प्रसारण
2.बिलासा महोत्सव बिलासपुर में प्रस्तुति
3.मल्हार महोत्सव में प्रस्तुति
4.भिलाई लोककला महोत्सव में प्रस्तुति
5.चक्रधर समारोह (गणेशोत्सव) रायगढ़ में प्रस्तुति
6.अनेक स्थानो पर मंचन प्रस्तुति
उपलब्धियाँ : 

1.आडियो कैसेट ”बटकी म बासी चूटकी म नून''
2.आडियो कैसेट संस्था (ग्रामीण बैंक) के लिए रचित एंव गाये गीतों का संस्था द्वारा ही ध्वनियांकित
प्रकाशन :  छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह “ मोर गँवई गॉंव”
सम्प्रति :  कैशयर “ छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक ”
संपर्क सूत्र : मनोहर दास मानिकपुरी
द्वारा कौशल्या कुँज, नेशनल कानवेंट स्कूल के पास,
रेल्वे लाइन के किनारे, भारतीय नगर,
बिलासपुर (छ.ग.) पिन - 495001
दूरभाष - (07752) 247743
मोबाइल - 097553-89955

छत्तीसगढ के रहइया,कहिथें छत्तीसगढ़िया,

मोर नीक मीठ बोली, जनम के मैं सिधवा।

छत्तीसगढ के रहइया,कहिथें छत्तीसगढ़िया।


कोर कपट ह का चीज ये,नइ जानौ संगी,

चाहे मिलै धोखाबाज, चाहे लंद फंदी।

गंगा कस पबरित हे, मन ह मोर भइया,

पीठ पीछू गारी देवैं,या कोनो लड़वइया।

एक बचन, एक बोली बात के रखइया,

छत्तीसगढ़ के रहइया, कहिथें छत्तीसगढ़िया।



देख के आने के पीरा, सोग लगथे मोला,

जना जाथे ये हर जइसे झांझ झोला।

फूल ले कोवर संगी, मोर करेजा हावै,

मुरझाथे जल्दी, अति ह न सहावै।

जहर महुरा कस एला, हंस हंस पियइया,

छत्तीसगढ़ के रहइया, कहिथें छत्तीसगढ़िया।



मोर बर रहय, न रहय, करन कस हौ दानी,

दान पुन धरम - करम करत जिनगानी।

माने म मैं देवता, बिफडेव़ तौ फेर नागिन,

धोखा म झन रइहीं, आघूले नइ लागिन।

करतब के मैं पूजा, दिन - रात के करइया,

छत्तीसगढ़ के रहइया, कहिथें छत्तीसगढ़िया।


रचना - मनोहर दास मानिकपुरी


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जतन-डा.परदेशीराम वर्मा की कहानी

डा. परदेशी राम वर्मा छ्त्तीसगढ अ‍उ छ्त्तीसगढी ला मया कर‍इया मनखे मन बर नवा नाव नो हरे १८ जुलाई १९४७ के लिमतरा मे जन्मे ये सैनिक मनखे हर सेना मा रह के देश के माटी के सेवा कर अ‍उ अब अपन कलम ले प्रदेश के माटी के सेवा करत हे ॥इन ला अगर छ्त्तीसगढ के प्रेमचंद कहे जाये त एहर अतिशयोक्ती न‍इ होवय। चुनाव अ‍उ दाउ मन के अत्याचार ला तोलत आज पढव उंकर एक कहानी "जतन "
" जतन "

हाथ मा मुड भर के ल‍ऊठी धरे अ‍उ कनिहा मा यहा बडा कटारी खोचें ,चरखना चद्दर ला लुंगी अस लपेटे पांच हाथ के मनखे सुरहुली गांव मा का आइस चिहुर उडगे । देखो देखो होगे ल‍इका मन डर्रा गे लीम चौरा मा ब‍इठ के खंजेरी मा भजन गव‍इया महराजी अ‍उ चेला मन बक्खागें भुलागे बजई-गवई एक झन सियान हा आंखी म हथेरी के तोबरा बनाके नटेर के देखिस अ‍ऊ कहिस -" बडे दाऊ के संडाये रे ।र‍इपुर ले आवत हे।सरपंच चुन‍ई भर रिही । बांचना हे तेमन बांच लव ।जेला जाना हे तेहा टिंगटिंगावय ।"
सहीच म संडा हा सोज रेंगत गीस अ‍ऊ बाडा के आगु मा जाके किहिस "दाऊ जी हम आ गये ।"
दाऊ के कुंदवा बडका कपाट के पिला पल्ला ल घुंचा के नौकर रतिराम निकरीस । पुछिस- काये ?
"दाऊ कहा हे ?"संडा पुछिस ।
"काबर?"
"हम आ गये है ।"
"काबर?"
"तुम्हारा सतौरी धरेबर ।साला ।काबर,काबर ।जाके बताओ दाऊ को कि र‍इपुर से आ गया है जतन अली ।"
रतिराम बांडा मा जाके बता‍इस ।अऊ बडका कपाट के दोनो माई पल्ला कटकटा के खुल गे। ्पिला पल्ला रतिराम अस छोटकुन मनखे बर बने हे अतन अली अस पचहत्ता अर बडका दरवाजा के दुनो पल्ला कोले बर परथे । जतन अली ल देख के रतिराम कहिस - "पिला दरवाजा हमर बर अऊ दुनो पल्ला तोर बर ।वाह रे विधाता।"
जतनअली हाँस के कहिस -"बाबु जादा रहोगे तो जादा पाओगे ।कमती रहोगे तो कमती पाओगे ।

रतिराम बात के मरम ला जान पातिस के दम्म ले बडे दाऊ के ब‍इठका आगे ।
जतन अली बडे दाऊ संग दुआ सलाम करिस।चाह पानी बर कहिके दाउ पुछिस-"जतन गजब जतन करे बर परही।नान नान बछरु मन हुमेले चाहत हे।"जतन के हाथ ल‍उठी मा चल दिस,कहिस-"दाऊ बताइये भर कि क्स सिर को पितल भरी लाठी भोंकने क शौक चर्राय्या है।बस्स।"
दाउ कहिस-"अब आ गे हस ता सिर गोड सब ला चिन्हा देबो।पांच घर के पठान हे इहा तुहर सगा उहु मन टिंग-टिंग करत हे।
जतन कहिस-"सगा फ़गा कुछु नही दाऊ।जिसका खाना उसका गाना।यह लाठी हिंदु सिक्ख,पठान इसाई नही पहचानती।इसीलिये तो मुझे लाठी आदमियो से ज्यादा अजीज है।"
"अजीज काय होथे जतन,अजीज तो हमर नौकर टुरा के नाम हे ।"जतन कहिस-अजीज याने बने लगता है।अच्छा लगता है।"
"हां ये बात हे।महुं ला नौकर टुरा बने लागथे।फ़ेर वोकर बाप रहमत ए गजब भडक‍इया।बुढा गे फ़ेर तिकडम न‍इ छोडीस।अब तंय सम्हालबे।पठानी चाल चलत हे साले हा।
* * * * * *

दुसर दिन टेक्टर मा ब‍इठ के बडे दाउ फ़ारम भरे बर निकरीस।संग मा बीस पच्चीस अ‍उ मनखे।टेक्टर मा सबले पहिली चढिस जतन अली ठेंग मार।"बडे दाउ के जय नारा लगीस अ‍उ दल हा फ़ारम भरे बर आगु बढिस।वोती दाउ हा फ़ारम बरे गीस अ‍उ येती गरिबहा मन करिस ब‍इठका।समेलाल किहिस-देस आजाद हे दाउ मन राज करिन सदा दिन।अब सुराज आगे त सरपंच बनके दाउगिरी करबो कहिथे।रोके बर परहि।सुखराम पुछिस -"क‍इसे रोकबो।पुरा के धार ,अंधौर के मार अ‍उ खुरचत गोल्लर के हुंकार ला डराये चाही।दाउ के आगु कोन खडे होही ,काखर दा‍इ हा दुध पियाये हे।"
बिना दा‍इ के दुध पिये ना दाउ नांदे हे ना तै बाढै हस निपोर के"।जब होही तब डरुवाथस।सुखराम के बात के जवाब दिस रमेसर हा।रमेसर गांव के नता मा सुखराम ला कका मानय।रमेसर के बात ल सुन के सुखराम किहिस-"रमेसर बेटा हमर दा‍इ ला छोड रे तोर दा‍इ हा कहुं बने ढंग के पियाये होही दुध ता तै खडा हो जा।रमेसर किहिस-"कका सब झन कहुं कहि दुहु त खडा होब मा काय हे गा ।सोचव।"
रमेसर गांव के मजदुर मन के नेता ये।निंदई के दिन मा ठेका मा निंदई करथे।गांव भर के मजदुर वोकर जस गाथे।गजब मजदुरी बाढ गे हे रमेसर के जोर मा।जब ले रमेसर हा शंकर गुहा नियोगी के लाल झंडा उठाये हे तब ले गांव मा अतियाचार करे के पहिली बडे दाऊ हा दु घाव सोचथे।शंकर गुहा नियोगी ला गोली दुश्मन मन टिपीन तेन दिन तौन दिन रमेसर के घर चुल्हा न‍इ बरिस।बडे दाउ बोकरा मरव‍इस।
रमेसर ल बाद मा सब बात ला सुखराम हा आके बता‍इस।के बडे दाऊ किहिस-"ज‍इसे शंकर गुहा ल मरवा देन,त‍इसने अरताप के सबो वोकर चेला ल टिपका देबो।एक गिलास चढा के वोकर संगवारी बिजलाल हा पुछिस-"दाउ तै टिपवाये हस शंकर गुहा नियोगी ला?तैं कहा टिपवाये हस दाऊ ठठ्ठा झन कर।"दाउ हांस के किहिस-अतेक बिसकुटक ला जान लेते त काबर।देख शंकर गुहा नियोगी के झंडा कोन उठाथे।"गरिब मजदुर किसान मन दाउ?हमर बेटा भाइ मन उठाथे का ?नही दाऊ।हमन पसंद करथन का शंकर गुहा के दल ला?नहीं दाऊ।
त देख जतका बडे बैपारी,करखनहा,बडे दाऊ,पुंजीवाला नेता,पुंजी के रखबारी करे बर जऊन दल बने हे तिंकर नेता सबके एक जात।"त शंकर गुहा नियोगी ला हमर सांही पुंजी के रखवार कोनों भाई मरवावय्ते हम मारन बात एके ये ना जी।बिजलाल किहीस-तोला त विधायक होना चाहि दाऊ धन रे तोर डिमाग ।"बने कहे बिजलाल आज नहीं त काली होबो ।अब सरपंची विधायकी सब अतेक महंगा होवत जात हे के गरिब त अब सपना मा न‍इ सपनाये।पुंजी वाला मन विधायक बनही। जौन विधायक बनही तौन पुंजीवाला होही।जौन पुंजीवाला होही तौन विधायक बनही। वाह अच्छा कबी हस दाऊ"।देख बिजलाल धन जेकर करा रथे न वो हा कबी,कलाकार,सबके बाप बन जथे।त धन धरावे तीन नाम परसा परसु परसुराम।रमायन मे हे ना कविता"परसु सहित बड नाम तुम्हारा" तौन बात ये।वाह दाउ बात-बात मा रमायन के उदाहरण त तहि देथस, दाउ बड गयानी हस।दाउ किहिस -एक गिलास अ‍उ चढा बिजलाल तहा देख मै अ‍उ का देखाहुं तोला।
वो रात भर मन के पिअई खवई चलिस।उही दिन दाऊ कहि दिस के आगु साल के सरपंची हमर करा रहे चाही।अभी बाई हा सरपंच हे।महिला मन बर हमर गाव ल नव टिप्पा धर दिन।का करन पथरा तरी हाथ चपका गे।गौटनीन सरपंचीन बनिस तब ले राज हमर चलत हे।अब संवागे हम सरपंच बनबो ।सब तुहंला अभी ले देखना हे।अभी सरपंच पति हन काली सौंहत सरपंच बनबो।
दाऊ सुनथौ उंकरमन बर गांव ला रिजरब करही कथें।"काकर मन बर बे-दाऊ किहिस-माफ़ी देहु दाउ।सतनमी पारा के सुरित काहत रहिस,अब आगु बछर हमर मन बर सरपंची उठही कहिके।"देखो जी डौकी सियानी दिन सियान हम बनेन।पिछडा मन के बात हम बर्दास्त कर लेबो काबर के हम खुदे पिछडा हन।फ़ेर सतनामी मन ला न‍इ दन,आदिवासी ल न‍इ दन।कुर्मी,तेली,कोस्टा,गहिरा,ठेठ्वार सब एक होना हे।
राउक ला दाऊ के बात बने लागीस कहिस-सब एक होगे का दाऊ।रोटी बेटी एक चलही का?दाऊ रखमखा के उठ गे किहिस-पांव के पनही मुड मा माडही कभं बे।अरे बात ताय।नारा ये जी।कुर्मी तेली भाई-भाई नारा काहत लागथे।जीत गे हमर मतवारी वाला टोपीधारी दाऊ हा।दुरुग मा राज हे ।रामरतन शर्मा टोक दिस कहिस-"दाउ कुर्मी के कु अऊ तेली के ते मिला के एक झन हा कुते बना दिस अऊ नारा चल गे कुते जीत गये बाम्हन हार गया ।
कहा के बात ल कहा लेगथस महाराज कुर्मी जीतिस याने बाम्हन जीतिस,कुर्मी तेली याने धनी मानी ।बाम्हन माने बुद्धी।त धन अ‍उ बुद्धी दुनु ला मिलके रहना परथे।बाकी सब डिरामा ये।जऊन कुते काहत हे तऊन दाउ घर जा के धडकत हे तस्मई अ‍उ खीर ।समझे के बात ये।सुखराम उठ के किहीस-मैं आज जानेव दाऊ कि बाम्हन, कुर्मी,तेली जतका बडका हव तेमन ढिमरा,धोबी,राऊत,नाऊ,लोहार,सब ला सेवा कर‍इया मानथव।चुनई के बेर तुमन हांस बोल लेथव अ‍उ बाद आ कुते मुते हो के फ़ेर एक हो जथव।मैं आज जानेव दाऊ ।मैं अब जाथव राम राम ।दाऊ के नशा उतर गे बिजलाल बक्कखागे।
दाउ के सबो संगवारी गजब मन‍इन फ़ेर कहा रुकना हे सुखराम ला।निकर गे बाडा ले ।वो दिन हे अ‍उ आज हे सुखराम फ़ेर बाडा मा न‍इ गिस।
बाडा ले निकर के सुखराम सिधा गिस रमेसर के घर।रमेसर घर चुल्हा न‍इ जरय रहे।शंकर गुहा नियोगी का मरिस रमेसर के सपना मर गे।"जेखर नाम ले के गरजन तेन शेर ला टिन दिस" रमेसर फ़ुसफ़ुसा के कहिस ।रमेसर ल धर के सुखराम गजब रो‍इस।मुंह डाहर ले भभका उंठे लागीस।रमेसर जान डारीस बडे दाउ घर ले आये हे चढे हे जम के।
सुखराम किहीस-बाबु रमेसर मोर भरोसा कर ददा,मे बडे दाऊ के घर पाल्टी खायें बर गे रहेव।सदा दिन शंकर गुहा नियोगी के बात ल तै बतवास आज गम पायेव।बडे-बडे रिही रमेसर छोटे-छोटे रिबो मोर बाप।काहत फ़ेर रोय लागीस सुखराम।
रमेसर किहीस-देख कका तैं पियेखाये हस ।जा सुत काली गोठीयाबो।अरे हमला पिंया खवा के बिचेत करही तभे त उंकर हाथ मा खेलबो।सराब के बडका कारखाना इंहा काबर खोले हे।चेत ल हेरे बर।जा कका काली आबे त कुछु सुनबो सुनाबो ।
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चुनई के ब‍इठका मे फ़ेर सुखराम ल बोकरा भात के सुरता आगे ।वोहा जम्मो किस्सा ल बताइस।रमेसर हा उठ के किहीस-"शंकर ददा हा छ्त्तीसगढ ले बाहिर ले आईस अ‍उ हमर मन के जिंदगी ला सुधारे बर मर गे।शहीद होगे।अऊ हमरे गांव के मनखे मन हमीं ल मरवाय बर फ़ेर संडा लाने हे र‍इपुर ले।त कोन हमर ये।शंकर ददा हा के गांव के दाउ हा।येला जान लौ संगी।भरम हे सब।पेट के एक जात,भुख के एक जात,ल‍उठी के एक जात,बंदुक के एक जात।ओकर बात ल सुन के रज्जाक अली उठ गे।किहीस-बिलकुल सही ये।र‍इपुर ले आये हे तेहर हमर सगा ये।मगर आये हे हमी ल बोरे बर।दाऊ घर उतरे हे हमर सगा होतीस त हमर घर उतरतीस।हमला भरमाय बर चाल चले जात हे।भरम मा न‍इ आना हे।मिलजुल के दाउ अ‍उ संडा के लौठी ला आगी मा झोंक देना हे। रमेसर किहीस-"आगी लगाय मा आगी लग जाथे।विचार के आगी लग जाये ते बहुत हे।हमर जनम-जनम के अंधविश्वास,डर, अज्ञान के कचरा जर जाये ये बहुत हे।बस आप सब तियार रहो,काली हमो मन जाबो सरपंच के फ़ारम भरे बर।
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संझौती जतन अली संग दाउ के दल हा फ़ारम भर के गांव मा आइस।नाऊ हा बता‍इस के गांव के सब मजदुर, किसान अ‍उ जम्मों रमेसर ल मन‍इया एक होगे हें।दाउ जतन डाहर देखिस।जतन किहीस-दाउ मैं थोरुक अपन हम-मजहब जौन भाई हे तिकर सो बात करता हुँ।जतन पहुचींस पठान पारा।दुवा सलाम के बाद रज्जाक के घर मा ब‍इठका होवीस।जतन किहीस-आप लोगो से गुजारिश है कि दाउ जी को आप साथ दे देवें।इसी मे हमारी भलाई है।काबर? रज्जाक पुछीस।काबर क्या दाउ जी से मेरी बात हो गयी है।इस पुरे इलाके मे मस्जिद नही है।आप लोग भी तो बस वैसे ही है।मैं मस्जिद के लिये जगह दिलवाउंगा और ईट सीमेंट अलग से।सजर अली कहिस-मस्जिद त तै र‍इपुर मा रोज जावत होबे बिरादर।हव नमाज के लिये जाता हुं।त इही सिखे हस भाई ल लालच देके गलत आदमी संग जोड देना हे।क्या मतलब?
मतलब ये के दाऊ ल आज तक हमर खियाल न‍इ आइस।आज मजहब अ‍उ मस्जिद के बात उठ गे।हम इंहा मनखे-मनखे ल मान सगा भाई के समान यँह सिद्धांत ज‍उन सब मजहब मा हे।उही ल हमर छ्त्तीसगढ के संत गुरु बाबा घासीदास कहे हे।उही बात ल मोहम्मद साहब,इसुमसी सबो झन कहे हे।सब मिलजुल के रहना चाही।त तै आयेंहस बैर कराये बर।बैर कैसा?अरे मस्जिद बनाबो त अम मिलजुल के बनाबो।दाऊ के पैसा म काबर बेचाबो।चुनई मा ठप्पा लगाना हे त मस्जिद बनवा दिही।
देवताधामी,धरम,महजब ल हमर छ्त्तीसगढ मा आरुग माने जाथे जी।चुनई बर एकर उपयोग दिल्ली मा राज कर‍इया मन करथे।हमर नानचुन गाव मा झन दांदर के दंदौरा करव।झगरा झन लगावव।आगी धरिस के स जरे लगही।जियन खान दव ददा ।धरम मजहब हा मेल कराथे लडवावय नही।हम इही सीखे हन।अऊ जब दिन आही मस्जिद बन के रही।हम अपन घर मा नमाज पढ लेथन बिरादर।खुदा कहा न‍इ ये।सब जगह हे।
इंकर एकता अ‍उ नेकी ल देख के जतन अली पैंतरा बदल दिस।किहीस-वाह तुम तो बडे नजुमी हो भाई।गालिब ने ठीक ही कहा है ।गालिब शराब पीने दे मस्जिद मे बैठ कर ,या वो जगह बता जहा पर खुदा नहीं।
वाह क्या समझ है।तो भाई,शराब मै आज पिलाकर रहुंगा।मुर्गा भी आ जायेगा।
रजब अली किहीस-मुर्गा त तय खुदे बन गे हस,अ‍उ धन के शराब मा माते हे दाऊ हा ।भाई मोर ये गांव ककरो बिगाडे ले नई बिगडे।बिगडैया खुदे बिगड जाही।कुकरा जोनी छोड सच्चा मानुस बन।अगर तै सच्चा मुसलमान होबे त अभी दाऊ के संग छोड अपन रद्दा ल धर लेबे।प्यार मोह्बब्त मेल के रद्दा।अरे मजहब बदनाम मत कर।हमर मजहब त सबके भलाई के संदेश देथे।सब संग मिलके रहे बर किथे।सबला जवाब उहों देहे बर परही।दाऊ ल झन डर्रा ,सबले बडे मालिक ल डर्रा।जऊ हा सब ल मिल के रेहे बर कहे हे।लडे-लडवाय बर न‍इ कहे हे।
पता नही का होइस के जतन अली के दुनो आंखी डबडबा गे।भर्राये गला मा किहीस-"चचा आंख खुल गई।माफ़ कर दो।इस गांव का सुकुन नही छिनना है मुझे। अभी निकल जाउंगा।मुह काला कर लुंगा।रज्जाक अली रोकीस किहीस-चार पहर रात हमरो पारा म रहि जा भाई।आजतक ल‍उठी के सहारा रेहे,आज परेम के सहारा रहि जा ।दाऊ के केहे मे आये अब हमर केहे मा जाबे।तय सगा अस गा।सगा अपन गोड मा आथे,बिदा करईया के गोड मा जाथे।रात ल काट ले बिहनीया चल देबे।दाऊ के माल-ठाल खुब उडाये,आज हमरो संग पसिया पी ले।
* * * * * *
होत बिहनीया दाऊ देखीस कि मुड भर ल‍उठी धरे,चरखना चद्दर के लुंगी लपेटे,अखब्बर जवान जतन अली र‍‍इपुर डाहर लाहंग-लाहंग जात राहय।गांव भर मा सोर उड गे,जतन जतना गे फ़ुर्र के उडिया गे।हफ़रत जा के दाऊ ल नाऊ ह किहीस-"तोर सब जतन अबिरथा गे दाऊ,अब समे बदल गे"।

दीपक शर्मा

एक दिन जाना हवय इंहा ले...




एक दिन जाना हवय इंहा ले सबला ओसरी पारी
तन कैसे कब कहाँ ये ककरो हाथ नहीं संगवारी


अजरा, जतखत, परे डरे कस का बिरथा जिनगानी
खरतर, गुनवंता, धनवंता जात सुघर तोर परानी
पाछू के बिसराके जम्मो आघू चलो सुघारी
एक दिन जाना हवय इंहा ले सबला ओसरी पारी


हित मीत बन जीलव जग में बैर भाव सिरवा के
कौन भला जस पाथे दूसर के अंतस पिरवा के
नाम छोड़ ढही जाहय सगरी सिरजे महल अटारी
एक दिन जाना हवय इंहा ले सबला ओसरी पारी


सम्मुहे गुरतुर पाछू चुरकुर दगाबाज गोठियाथे
परहित अउ परकाज करे खातिर जौन मन ओतियाथे
मतलब साधे बर बोलय हितवा संग घलव लबारी
एक दिन जाना हवय इंहा ले सबला ओसरी पारी


चारी चुगरी कर नारद छल कर सकुनि कहवा ले
तोर अमोल तन ला गंगा चाहे डबरी नहवा ले
ये कंचन काया खोजे में फिर नई मिले उधारी
एक दिन जाना हवय इंहा ले सबला ओसरी पारी


पाप पुन्न सब धरम करम अउ रात दिन सुख दुःख के
उंच नीच गहिरा उथली संग नींद पियास अउ भूख के
सिरिफ निबहैया वोही करैया हे सबके चिनहारी
एक दिन जाना हवय इंहा ले सबला ओसरी पारी



तोर मोर का जम्मो झन के एक ठन वोही गोसईया
चिरई चुरगुन चीटी ले हाथी तक वोही पोसैया
मन के सगरी भरम छोड़ के ओखरे पाँव पोटारी
एक दिन जाना हवय इंहा ले सबला ओसरी पारी

रचयिता
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर

संगी मन थोरुक बढे चलव गा

अब झन करव अबिरथा अबेर गा
संगी मन थोरुक बढे चलव गा
भाई मन चिटुक बढे चलव गा !!

अतियाचार करिन बैरी जब तुम निचट देह डारेव !
सुमता छांड अपुस मा दुरमत ला हितवा कर डारेव !!
लाज लुताइस दाई दीदी के , होइस अब्बड़ हलाल !
फांसी चढ़ गय मान रखे बर कई झन माई के लाल !!
अब मत होवे ओइसनहे अंधेर गा....
संगी मन थोरुक बढे चलव गा ...

अंतियावत अब चलव जवारिहा धन होय तुंहर जवानी !
माटी खातिर मर खप जावव कर लव नाव निसानी !!
सुघर घरी हे सुघर महोरत अउ सुघर मौका हे !
देश के झंडा ऊपर उठावव तब संगी ठौका है !!
पवन पावय झन दिया ल चलव घेर गा ....
संगी मन थोरुक बढे चलव गा ...

महतारी के बीर पुट अउ समरथ तुंहर में भारी !
छुए मा माटी सोन होथे गुन तुंहर हे बलिहारी !!
चाहव त पाटे समुंद पटावय फोरे फूटे पहार !
भेदभाव के ठाडे जब्बर लउहा फोरव करार !!
मन मा काबर करत हवव तभो ढेर गा ...
संगी मन थोरुक बढे चलव गा ....

तुंहर जोम अउ जोर गजब हे दुश्मन घलव बखाने !
ये धरती के रित नित ला दुनियाँ घलव हा जाने !!
गुसियावाव तो लखन लगव अउ मरजादा म राम !
हुंकारत मा हनुमत लगव करम करत घनश्याम !!
रिनहा जग हे भले , तुम हवव कुबेर गा.....
संगी मन थोरुक बढे चलव गा ...

जौन गिरे, हपटे, मदियावत बांह पकड़ के उठावव !
निर बुद्धि ,भकला, जकला ला घलव गा संग लगावव !!
बिलग बिलग मा बल बंतांठे बैरी बैर सधाथे !
सुमता देख सुमत घर-घर में सुख सौंपत पहुन्चाथे !!
अईसन घरी इंहा आथे एको बेर गा ...
संगी मन थोरुक बढे चलव गा ...

अब कभू कोई अतियाचार के झन घपतय अंधियारी !
जम्मो जुरमिल करम धरम के चलव दियना बारी !!
नवा समे के नवा देश मा नवा बिहान करव गा !
सरग बनाए बर भुइया ला सही धियान धरव गा !!
सतयुग ला लावव कलजुग मा फेर गा ...
संगी मन थोरुक बढे चलव गा ...

गजब भागीरथ तप कर जानव गंगा लाये हन !
कठिन बड़े महाभारत लड़के तिरंगा पाए हन !!
रंग बिराजे तिन गुन एकर , तीनो ताप नसांवय !
महिमा महामंत्र जप एकर जन गन मंगल पांवय !!
सरके चलाव तभे पहुंचब संझकेर गा ....
संगी मन थोरुक बढे चलव गा ...!!

रचियता
सुकवि बुधराम यादव
वर्ष-१९७८ बिलासपुर

फोकट के बिजली ल तोरे घर मे राख

छतीसगढ़ काँग्रेस के प्रभारी नारायण सामी के कहना हे कि अगर छतीसगढ मे काँग्रेस के शासन आही ते किसान मन ल फोकट मे बिजली दिही । हमन ह दिगविजय सिँग के फोकट के बिजली के तमशा ल देख डरे हे अव जानथन कि “ फोकट ले पाय ते मरत ले खाय “ बरोबर फोकट के चीज ह नइ पचे । दिग्विजय सिँह के सरकार फ फोकट मे बिजली देबो केहे रिहिस त हमन भारी खुश होय रेहे हाबन कि अब मोटर ले चौबीसो घँटा चला के अपन खेत ल पलो ले लेकिन एक साल के अँदर ये फोकट के बिजली के नशा ह उतर गे । दिन भर मुश्किल ल 6-8 घँटा बिजली ताहन दिन भर मोटर बँद । अब पलो ले पानी ल 24 घँटा ? यहू 6-8 घँटा के बिजली ह सल्लग नइ रहाय , कतका बेर आय अव कतका बेर जाय तेकर ठिकाना नही । अइसन मे किसान ह काकरही, दिन भर “ बिलइ ताके मुसवा भाँड़ी ले सपट के बिलइ ताके “ बरोबर मोटर के आघु मे बैठे रा अव जब – जब बिजली आय तब मोटर के बटन ल चपकत र । तब ले देके पानी ल पलोय सकन । जब धान के पाकती आय अव जे समय पानी के एक्दम जरूरत राहय ते समय ते रात भर जगवारी जागेल लागे । रात मे घेरी-बेरी बिजली गोल अव मोटर बँद । रात भर उठ-उठ के देखेल लागे कि मोटर तो बँद नइ हो गेहे । अब तो खैर आटो-स्टार्ट मोटर आगे हे जे ह अपने – अपन बिजली आथे ताहन मोटर ल चालु कर देथे लेकिन ओ समय मे ये सिस्टम ह नइ रिहिस हे । मोला नइ पता कि आटो-स्टार्ट सिसटम ह कानूनी रूप से वैद्य हे कि नही लेकिन आजकल सब मोटर –पँप वाला मन आटो-स्टार्ट लगा डरे हे । लेकिन येकरो बहुँत नुकसान हे , सब के मोटर एक सँघरा शुरू होइस ताहन ट्राँसफार्मर ह दाँत निपोर देथे । येकरे सेती अब तो अइसन झँझट-फटफट ल देख के फोकट के बिजली के नामे ल सुन के घुरघुरासी लागेल धर ले हे , अव अब फेर काँग्रेस वाला मन ओकर खिलौना देके के लुलवायल धरत हे ।
हमन तोर पाँव परत हन भगवान ते ह हमन ल फोकट के बिजली ल झन दे । हमन ल दिन मे 24 घँटा बिजली चाहिए न कि फोकट के बिजली । हमन ह बिजली बिल के पैसा ल पटा डरबो लेकिन फोकट के बिजली के नाम मे कहुँ 2-4 घँटा के बिजली देबे तब त हमर मन के साँस चलत हे तहु ह अटक जही । काँग्रेस पारटी ल ये बात समझ मे आ जाना चाहिए कि फ़ोकट के बिजली के सपना ह अब किसान मन ल नइ लुलवायल सके । हाँ अगर काँग्रेस पारटी ह चौबीसो घँटा बिजली देबो कहिके कही त किसान मन जरूर येकर स्वागत करही । आज के समय ह 24 घँटा के बिजली के वादा करे के हे न कि फोकट के बिजली के वादा करेके । काँग्रेस पारटी ह अपन ये गलती ल जतका जल्दी सुधारही ओतका जादा फायदा मे रही नही ते फोकट के बिजली के वादा ह खुद उँकरे जी के जँजाल बनही ।

सारी

आजकल रोज सरी बिहनीया अ‍उ संझा दानेश्वर बबा के कविता ला पढत हव बने सुघ्घर लिखे हवय !!
आज पढव उंकर एक ठीन रोमांटिक गीत अपन सारी बर ॥

मोर सारी परम पियारी गा
र‍इपुरहिन अलग चिन्हारी गा
कातिक मा ज‍इसे सियारी गा
फ़ागुन मा ज‍इसे ओन्हारी गा
हाँसय त झर-झर फ़ुल झरय
रोवय त मोती लबारी गा ॥

एक सरीं देह अब्बड दुब्बर
झेलनाही सोंहारी जस पातर
मछरी जस घात बिछ्लहिन हे
हंसा साही उज्जर पाँखर
चर चर ल‍इका के महतारी
फ़ेर दिखथय जनम कुँवारी गा ॥

लेवना साँही चिक्कन दिखथे
कोयली साँही गुरतुर कहिथे
न जुड सहय न घाम सहय
एयर कन्डीसन म र‍इथे
सरदी म गोंदा फ़ुल झँकय
गरमी म भाजी अमारी गा ॥

आँखी म क्लोरोफ़ार्म हवय
विन्टर मा घलो वार्म हवय
नुरी पिक्चर के हिरो‍इन
साँही जौंहर के चार्म हवय
अपने घर सेंट इतर चुपरय
महकय चार दुवारी गा ॥


दीपक शर्मा
विप्लव

मोर कुंवर कन्हैया...!


जन्माष्टमी के पावन बेरा मा...परसतुत हे॥
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें ....




मोर कुंवर कन्हैया...!


मोर कुंवर कन्हैया बलदाऊ के भइया
तैं झन जाबे माखन चोराय
बदनाम होथे भइया तैं झन जाबे माखन चोराय !

नौ लाख गइया उबरय नन्द महर घर
लाखन हें बछुरा बंधे !
दूध अउ दही के गा नंदिया बोहाथे
माखन सकले नई सकलाय !!
अतको मा का घट गय तोरबर कन्हैया
ओरहन जौन लाथस बलाय !
बदनाम होथे भइया तैं झन जाबे माखन चोराय !

मन लागय जतका माखन मिसरी लल्ला

घर में गुवालन संग खाव !
पन खोंची भर खातिर औरे घर जाके
चोरहा ये नाव झन धराव !!
घेरी बेरी बरजेंव नई मानस कन्हैया
दिन दिन तैं जाथस नथाय !
बदनाम होथे भइया तैं झन जाबे माखन चोराय !

खाये पीये के बस ओढर बनाथस
मसर मोटी करथस तैं जाय !
दैहा दूधहा के सब राहित छडा थस
सिकहर ले देथस गिराय !!
चिखला मतांवय तोर संगवारी चेलिक
अउ नाव तोर देंथय टिपाय !
बदनाम होथे भइया तैं झन जाबे माखन चोराय !


काय तोर नाठाइन ओ गरीब सब गुवालिन
जाथस बदला जेकरा भंजाय !
काय डार दिहिन उन माखन मा मोहनी
जौन गये तैं निचट मोहाय !!
कान धर कान्हा किरिया खा अब 'बुध' कहे
मान तोला जसुदा समझाय !
बदनाम होथे भइया तैं झन जाबे माखन चोराय !


रचयिता
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर

अपन गोठ...

सुकवि बुधराम यादव जी के रचित थोरकुन गीत, कविता, जागरण गीत , मुक्तक , साखी के गुरतुर-गोठ अउ मनोरथ के माध्यम से आप मन अवलोकन करेव । ये सब मोर तीर जौन आदरणीय के जुनाहा संग्रह रहिस ओखरे खजाना आए। ...उनकर गीत/रचना प्रसतुत करईया तो मे हवव , पर आपोमन ला ऐसे लगत होही के उनकर रचना बर आपमन के जौन प्रतिक्रिया बिचार मिलथे ,तेखर बर आदरणीय बुधराम जी के का सोचना हवे..... ता मे उंखरे खजाना - संग्रह म ले एक उंखर लेख इन्हा पोस्ट करत हंव ....... आर्शीवाद देहव

अपन गोठ...

मिरगा कस बिरथा तिसना पाले जनव उचाट मारत जिनगी हा तीसर पहर म कब हबर गय पता नई लगिस , पीछू डहर झाँके ले बहुत पहाये अउ थोरे बचाए के मरम हा सालथे , जीव ला कचोटथे अउ सुरता आथे नीत के ओ गोठ जौन माता-पिता , गुरुजन अऊ बड़का सियान मन ले सुने रहेन अऊ जेकर परभाव हा आज घलव संकलप के रूप म हावय के .......

सेवा म अरपन कर सगरी -अपन हित बिसराके
करज चुका ले महतारी के मनुख तन ये पाके

सोरह आना सच आय के ----- आये हें सो जाये बर राजा रंक फ़कीर जमो निचट जुच्छा हाथ , जत्तेक इंहा पाये , कमाए हें इहें गवाएं परही।


" अंचरा के मया " जनम देवैया महतारी अउ कोरा म बसर देवैया धरती महतारी दुनो के मया के बखान अउ महिमा गान करे के लइकानी जतन आय , जौन हां ये माटी के दुलौरा जमो मनखे तक कुछ आखर मा पहुचाये ले बिस्वास हे जरुर सनेह अउ दुलार के भागी बनही


ये गीत अऊ कविता मन ला एक संग्रह के सकल देवाय म मोर हित-मित साहित्यकार मन के संगी धुरंधर साहित्यकार अउ प्रयास प्रकाशन के निदेशक डॉक्टर विनय पाठक के गजब आभारी हँव ।

परम आदरणीय पंडित राजेंद्र प्रसाद शुक्ला , डॉक्टर पालेश्वर प्रसाद शर्मा जइसन प्रतिष्ठित अउ वरिष्ठ मनीषी मन के दू आखर आसिरवचन अउ सनेह के खातिर बहुते आभारी हंव ।

भाई कृष्ण कुमार भट्ट 'पथिक ' , डॉक्टर अजीज रफीक अउ सनत तिवारी घलव ला धन्यवाद ।

गीत - कविता के ये संग्रह मोर पूजनीया महतारी अउ पिता ला परम श्रद्धा सहित समर्पित हवय। जिनकर असीरवाद के आन्छत अपन भाखा के सेवा मा ये अरपन होए पावत हे ।

1966-67 ले प्रयास प्रकाशन ले जुरे साहत्या यात्रा म , बिसरत , भुलावत , रेंगत , सुस्तावत बरस 2001 मा बिलासा कला मंच के छैन्हा मा घाम घाले बर पहली ठीहा पाईस ।

आख़िर मा ये माटी के जमो गुनिजन , मुनिजन , सुधिजन , गुरुजन अउ बुधजन मन ले निवेदन हवय के येला पढ़के , सुन के , देख के एकर बने अउ घिनहा ला पोगरी झन पचोंहय। अपन सनेह संग सुघर सुझाव अउ आसिरवाद ला बिना अबेर करे मोर कटी भेजे बर झन भुलाहन्य ।

तुंहर सनेह अऊ दुलार के अगोरा मा.......
पता...
बुधराम यादव
एम.आई.जी.ए/8
चंदेला नगर
रिंग रोड नं. 2
बिलासपुर छत्तीसगढ़

तपत कुरु भ‍इ तपत कुरु



संजीव भैय्या के किरपा अ‍उ परयास के फ़लस्वरुप एक ठीन किताब हाथ लग गे हे नाम हाबे "तपत कुरु भई तपत कुरु " अ‍उ एखर लिखैय्या हाबे प्रसीद्ध प्रवचन कर्ता श्री दानेश्वर शर्मा जी एमा एक से एक मजेदार छ्त्तीसगढि गीत हाबे उही मे से एक ठिन ला ए मेर लिखत हाबो कबर कि जम्मो सुघ्घर चिज ला मिल बाँट के खाये के हमर छ्त्तीसगढि परंपरा हाबे ॥ त आवव पढव एक ठिन मजेदार गीत ......

तपत कुरु भ‍इ तपत कुरु
बोल रे मिट्ठु तपत कुरु
बडे बिहनिया तपत कुरु
सरी मँझनिया तपत कुरु
फ़ुले-फ़ुले चना सिरागे
बाँचे हावय ढुरु-ढुरु ॥

चुरी बाजय खनन-खनन
झुमका बाजय झनन-झनन
गजब कमैलिन छोटे पटेलीन
भाजी टोरय सनन-सनन
केंवची-केंवची पाँव मा टोंडा
पहिरे हावय गरु-गरु ॥

बरदि रेंगीस खार मा
महानदी के पार म
चारा चरथय पानी पीथँय
घर लहुँटय मुँदिहार म
भ‍इया बर भ‍उजी करेला
राँधे हावय करु-करु ॥

पानी गिरथय झिपिर-झिपिर
परछी चुहथय टिपिर-टिपिर
गुरमटिया सँग बुढिया बाँको
खेत मा बोलय लिबिर-लिबिर
ल‍इका मन सब पल्ला भागँय
डोकरी रेंगय हरु-हरु ॥

दीपक शर्मा
विप्लव

बियंग : मोबाईल मास्‍टरिन

मास्‍टर क‍हे के मतलब, मास्‍टर माइंड नो हे, फेर आजकल तो कलजुगी इस्‍टाईल के गुरू हर, अपन ला चाल्‍स सोभराज ले कोन्‍हों कम नई मानय । फोकट चंद अउ घिस ले चंदन, ऐमन ला पोगा पंडित अउ भकला महराज के उपाधि ले घलो नवाज अउ जाने जाथय । फेसन के चिखला सहर, महानगर भर मा हावय, अइसन न हे, आज के माहोल मा तो गली-कूचा अउ खोर-खोर मा येहा बगरे हावय । तेमा कोन कहाय, ओ चिपरू, मंदू अउ लडबडहा मनखे मन करा घला खिसा मा मोबाइल ह चटके रहिथय । इसकूल म मोबाइल के परितबंध कानून कइ घांव बनिस अउ बनते रही, फेर कब पुख्‍ता बनही फेर नई, तेला तो बडका गुरू रइपुर वाला मन जानही । कहे भर मे अउ कागद में गोल-गोल रानी, इता-इत्‍ता पानी के खेल खेले मा, लइकामन का, कोनो नइ अघाय । अइसे कर सिकछा विभाग के करम हावय ।


गांव तीर के इसकूल अउ ओमा नवां-नवां मटमटही फेसनहिन अउ चमकूलहिन मेडम के पोस्टिंग हावय । दसबज्‍जी इसकूल आय फेर गियारा बजती मा, रोज दिन चपरासी फिरंता करा फून आही - इसकूल खुल गे का ? पराथना होगे का ? अउ मेडम मन आ गे का ? गोल्‍लर गुरूजी आगे का ? मोर ककछा के सब्‍बो झन लइका मन आये हे का ? अउ रंग रंग के परसन ला सुनत-सुनत फिरंता के मइनता डोल जथय ।

निस दिन नवां-नवां, रंग बिरंगी बहाना - आज हेड आफिस जावत हों, राज सर संग ओखर फटफटी मा आहूं । मोर गरहजरी झन लगाही कोनो हा । उहिती एसकालर सिप अउ कनिया परोतसाहन के रकम के जानकारी घलो लेना हे । लइका मन के कापी ला तिही हा जांच देबे, अउ बाठू गुरूजी काहीं कही त फेर में हा आके ओखर ले निपटत रहूं । अवइ-जवइ मा दू घंटा पहा गय, त इसकूल के डेरउठी मा पहुंचिन हावय । आते साथ मधियान भोजन झडकिन, पेट थोरकन अघाईस अउ अगया कम होइस त रंधइया ला मार बखान डारिस - रोज दिन उही कोचरहां आलू अउ सोयाबीन बरी ला देख डारे हे । सरकार कतकोन पुरोही फेर इखर नियत खोट्टी, कभू कम नइ होवय । जब रांधही ते फकत सरहा-गलहा ला, सम्‍मार होवय चाहे सनिच्‍चर, इखर सरी दिन सनी माढे रहिथय । फेर काय करबे खायेच ल परथे, तिर-तखार मा कोनो किरहा-खद्दू, भडू मन के होटल ढाबा घलो नइ हावय ।

इसकूल के आधा बेरा ढरक गे त  मेडम जी हा किलास रूम मा आइस, लइका मन ला बड खुसी मा जय हिंद मेडमजी कहि के सांस भर मा कोल-बील कस जय हिंद मनइस । ततकेच बेरा मेडम के बेग मा माढहे मोबाइल के घंटी बाजे लागिस - करेजी किया रे, घेरी बेरी किया रे .... काय करेजी ते । मेडम बोलिस - हलो, मेहा मोंगरा बोलत हंव । ओती ले बवाज अइस - मेहा तोर दाई ओ बेटी । काय करत हस ओ, तोर इसकूल खुलगे का ? - पांव परत हों दाई, ददा के जर हा बने होइस का ? अउ नवां भउजी के लेवइया मन आगे का ? अउ छोटे बहिनी दसमत ला कब लेबर जाहू ? अब सूरू होइस ते कहां रबकने वाला हे, आधा-पउन घंटा-दू घंटा बीत गेय । एती चपरासी ह पूरा छुट्टी के घंटा घलो बजा डारिस । अइसे-तइसे इसकूल के पढई चलत हावय । फेर कोनो ला काहीं सिकायत नइ हे । काबर कि मेडम आये त, गांव भर के मनखे ला बड निक लागय अउ इसकूल ह घलो गदगद बोलथय । अब गांव-गांव के सरकारी इसकूल घलो, हाइटेक होगय हावय । इही ला तो कहिथय - नवां बिहान होगय ।

राजाराम रसिक

मुक्तक..


मुक्तक..



पर के पीरा हा जेकर हिरदे मा जनावत हे
पर के पीरा ल जौन अपन कस बनावत हे !
ऐसनहा मनखे, मनुख नोहय देवता ये
पर के पीरा हरत जौन जनम पहावत हे !!




मांगे ले इक घरी ना कौनो उधार देंहय
बुडे जिनगी के डोंगा नई कउनो उबार देंहय !
माउका मिले हे जम्मो बिगडे बना ले संगी
रो रो गोहराबे तभो न कउनो सुधार देंहय !!




सत अउ इमान सही कउनो धरम नइये
अपन बिरान सही कउनो भरम नइये !
पर के हितवा बन के जिनगी पहा ले
'बुध' अइसन गियान सही कउनो मरम नइये !!




रतन अमोल धरे इंहा उंहा भटकत हें
बिरथा बर रात दिन माथा ला पटकत हें !
मरम नई पाइन सिरतो मनुख तन पाये के
सैघो ला छांड तभे आधा मा अटकत हें !!




बूता ओसरावय नहीं एती ओती टारके मा
रस्ता नापावय नहीं मरहा जईसे सरके मा !
सुघर करम के बिन जिनगी महमहावय नहीं
बैरी डरावे नहीं दुरिहा ले बरके मा !!




रचयिता...
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर.....

साखी....


साखी....


एक झन के जन्माये एक अँगना मा खेलेन बाढें !
हिन्दू सिख ईसाई मुल्ला फेर कैसे बन ठादें !!




जनधन पाके अतियाँवय अउ पद पाके गरुवाय !
जोबन पाके इतरावय पर एक्को संग ना जाय !!




बिरथा करत गुमान हवस ये कभू दगा दे जाहय !
हाड़ मास के पुतरी संगी माटी मा मिल जाहय !!




कए दिन के जिनगानी सुघ्घर हांसत खेलत पहा ले !
गुरतुर भाखा बाउर के भईया अंतस ला फरियाले !!




काम क्रोध अउ लोभ इनकर किस्सा ला कतेक बखानी !
जिनगी के जब्बर बैरी तीनों अवगुन ल जानी !!




घरी घरी घुरत हे जिनगी पल पल खिरत जाय !
बिना तेल के बाती कस जाने कब जाहे बुझाय !!




चार लाख चौरासी भटके तब मनखे तन पाये !
देहरी मा ठाडे गुण भीतर घुसरे के बिसराये !!




पानी भीतर के पुरैन कस ये दुनिया मा जीले !
जम्मो रस के सार राम-रस तैं जी भर के पीले !!




दुसर के दुःख देख देख दुरिहाले जौन मुस्काथे !
'बुध' काबर नई सोचे एक दिन ओकरो ऊपर आथे !!




रचयिता .....
सुकवि बुधराम यादव..
बिलासपुर...

जमुनिया के डार : धनी धर्मदास के गीत

जमुनिया के डार मोर टोर देव हो ।
एक जमुनिया के चउदा डारो, सार सबद लेके मोर देव हो ।
काया कंचन अजब पियाला, नाम बूटी रस घोर देव हो ।
सुरत सुहागिन गजब पियासी, अमरित रस में बोर देव हो ।
सतगुरू हमरे गियान जौहरी, रतन पदारथ जोर देव हो ।
धरमदास के अरज गुंसाई, जीवन के बंदी छोर देव हो ।


धनी धर्मदास


संत कबीर मठ, दामाखेडा

कबीरपंथ के छत्तीसगढ़ी साखा के सिरजन करईया धनी धर्मदास जी रहिन । इखर जनम मध्यप्रदेश के रींवा जिला के बांधवगढ़ में होये रहिसे । येमन सियानी उमर म तीरथ जातरा बर गीन अउ उहें मथुरा म इखर मुलाकात संत कबीर मेर होइस । कबीर के गियान ले धर्मदास हर मूर्तिपूजा ला छोड़ दीस अउ संत कबीर ला अपन घर बांधवगढ़ आये के नेउता दीस, सब्‍बो परिवार सहित उखर मेर कान फूंका लीस ।


सियान मन बताथे कि जब धर्मदास साहेब ह जिंखर कान फूंकाये के पहिली नाम जुड़ावन प्रसाद रहिस, बांधवगढ़ म संत समागम आयोजित करे रहिस औ उहां संत कबीर घलव उंखर नेवता म पधारे रहिसे । इही समे धर्मदास हर संत कबीर के बात मान के अपने पहिली गुरु रूपदास जी मेर असीस लेके अपन बाई सुलक्षणा देवी औ लईका नारायणदास अउ चूरामणि समेत कान फुंकवाईस । ओखर बाद सुलक्षणा देवी आमिन माता व चूरामनि, मुक्तामणि के नाम ले जाने गीस। संत कबीर ह धर्मदास ल सब्‍बो संपत्ति ल दान करे के बाद घलोक धनी कि‍हके बलाईस तब से इनला धनी धर्मदास कहे जाथे ।


(ये बिबरन भाई संजीत त्रिपाठी के पतरा आवारा बंजारा ले ले गेहे अउ गीत भाई सुशील यदु के 1993 म परकासित कबिता संग्रह 'बगरे मोती' ले ले गे हे )

नयना नीर भरे


नयना नीर भरे कोई फिर ना झरे
नाही कोई किसी को छले
आओ सबसे से मिले गले.....
इस चमन में अमन की वो गंगा बहे
जन गण सदियों सलामत औ चंगा रहे
धरा धर्ममय सर्वसम्पन्न जन
भूख भय भेद संत्रास के हो दमन
दिन प्रतिदिन और फूले फले
आओ सबसे मिले हम गले ......

क्रांतियाँ जोड़कर हम शिखर पर चदें
भ्रांतियां तोड़कर हम निखरकर बढ़ें
प्रीति परतीति मन में पिरोते रहें
स्नेह समता समन्वय संजोते रहे
यूँ ही चलते रहे सिलसिले
आओ सबसे मिले हम गले ....

दौर अनचाहे विपरीत जो भी चले
बीज किन्तु विलग के ना कोई पले
यह हमें आस और पूर्ण विश्वास
जमीन एक और एक आकाश हो
खुशियाँ नितनव जहाँ हर पले
आओ सबसे मिले हम गले

नयना नीर भरे कोई फिर ना झरे
नाही कोई किसी को छले......

रचयिता.....

सुकवि बुधराम यादव

छत्तीसगढ़-गौरव

हमर देस

ये हमर देस छत्तीसगढ़ आगू रहिस जगत सिरमौर।
दक्खिन कौसल नांव रहिस है मुलुक मुलुक मां सोर।
रामचंद सीता अउ लछिमन, पिता हुकुम से बिहरिन बन बन।
हमर देस मां आ तीनों झन, रतनपुर के रामटेकरी मां करे रहिन है ठौर।।
घुमिन इहां औ ऐती ओती, फैलिय पद रज चारो कोती।
यही हमर बढ़िया है बपौती, आ देवता इहां औ रज ला आंजे नैन निटोर।।

राम के महतारी कौसिल्या, इहें के राजा के है बिटिया।
हमर भाग कैसन है बढ़िया, इहें हमर भगवान राम के कभू रहिस ममिओर।।
इहें रहिन मोरध्वज दानी, सुत सिर चीरिन राजा-रानी।
कृष्ण प्रसन्न होइन बरदानी, बरसा फूल करे लागिन सब देवता जय जय सोर।।

रहिन कामधेनु सब गैया, भर देवै हो लाला ! भैया !!
मस्त रहे खा लोग लुगैया, दुध दही घी के नदी बोहावै गली गली अउ खोर।।
मरत प्यास परदेसी आवै, पीये बर पानी मँगवावैं।
पानी ठौर म दूध पियावैं, जाय विदेसी इंहा के जस ल गात फिरैं सब ठौर।।
नाप नाप काठा म रूपिया, बेहर देवत रहिन गऊंटिया।
रहिस इमान न ककरो घटिया, कभू नहीं इस्टाम लिखवाइन लिहिन गवाही और।।

धनी रहिन सब ठाम ठाम मां, मुहर सुखावत रहिन घाम मां।
फेर पूजा कर धरैं माँझ मां, दिया दिखावैं, चँवर डोलावैं पावें खुसी अथोर।।
घर मां नहीं लगावें तारा, खुल्ला छोड़ मकान दुवारा।
घूमैं करैं काम ा सारा, रहे चीज जैसने के तैसन कहूं रहिन नहिं चोर।।

सबो रहिन है अति सतवादी, दुध दही भात खा पहिरै खादी।
धरम सत इमान के रहिन है आदी, चाहे लाख साख हो जावै बनिन नी लबरा चोर।।
पगड़ी मुकुट बारी के कुंडल, चोंगी बंसरी पनही पेजल।
चिखला बुंदकी अंगराग मल, कृष्ण-कृषक सब करत रहिन है गली गली मां अंजोर।।

रहिस बिटिया हर नंदरैया, भुइंये रहिस जसोदा मैया।
बैले बलदाऊ भैया, बसे गांव गोकुल मां बन-बन रहिन चरावत ढोर।।
रहिस कोनो खेत भात के थरिया, कोन्नो रहिस दार थरकुरिया।
रहिस कोन्नो रहिस रोटी के खरिया, कोनो तेल के, कोनो वस्त्र के, कोनो साग के और।।

सबे जिनिस उपजात रहिन हैं, ककरो मूं नई तकत रहिन हैं।
निचट मजा मा रहत रहिन हैं, बेटा-पतो, डौकी-लैका रहत रहिन इक ठौर।।
अतिथि अभ्यागत कोन्नो आवें, घर माटी के सुपेती पावे।
हलवा पूरी भोग लगावें, दूध दही घी अउ गूरमां ओला देंय चिभोर।

तिरिया जल्दी उठेनी सोवे, घम्मर-घम्मर मही विलोवे,
चरखा काते रोटी पोवे, खाये किसान खेत दिशि जावे चोंगी माखुर जोर।
धर रोटी मुर्रा अउ पानी, खेत मा जाय किसान के रानी।
खेत ल नींदे कहत कहानी, जात रहिन फेर घर मां पहिरे लुगरा लहर पटोर।

चिबक हथौरी नरियर फोरैं, मछरी ला तीतुर कर डारैं।
बिन आगी आगी उपजारैं, अंगुरि गवा मां चिबक सुपारी देवें गवें मां फोर।
रहिस गुपल्ला वीर इहें ला, लोहा के भारी खंभा ला।
डारिस टोर उखाड़ गड़े ला, दिल्ली के दरबार मां होगे सनासट सब ओर।

रेवाराम गुपाल अउ माखन, कवि प्रहलाद दुबे नारायन।
बड़े बड़े कवि रहिन हैं लाखन, गुनवंता बलवंता अउ धनवंता के अय ठौर।।
राजा रहिन प्रतापी भारी, पालिन सुत सम परजा सारी।
जसके रहिन बड़े अधिकारी, आपन जस के सुरूज के बल मां जग ला करिन अंजोर।

कहाँ कहौं गनियारी घुटकू, कहि देथौं मैं एक ठन ठुपकू।
आंखी, कांन पोंछ के ननकू, पढ़ इतिहास सुना संगवारी तब तैं पावे सोर।

इसके रचनाकार छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित शुकलाल पाण्डेय हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ''छत्तीसगढ़ गौरव'' से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके प्रस्तुतकर्त्ता हैं प्रो. अश्विनी केशरवानी .

दमांद बाबू दुलरू

एक गांव मा एक बनिया रहत रहिस । ओखर मन करिस त वो ह परदेस कमाय बर निकल गिस ।
दूसर देश म जाके बनिया ह गजबेच्चओ धन कमाईस । फेर धन के भोरहा म वो ह अपन नोनी बाबू ल नई भुलाईस । बनिया ह अपन कमई के जन दोगानी मोटरिया के अपन गांव लहुटे बर तियार होगे । फेर वो ह मने मन गुनिस के घर अमरे के पहिली चिठी डार दौं त घर मा परवार के जम्मो झिन सकला जाहीं । अईसे गुन के बनिया ह गांव बर चिठी लिख के डार दिस अउ अपन मोटरी मोटरा ल धर के गांव बर लिकल गे ।

एक पाख बनिया ल गांव आये मा लगगे अउ ऐती बनिया के दमांद जउन ह अपन ससरार के रखवार बनके राहत रहय जेन ल बनिया के भेजे चिट्ठी ल हरकारा ल देईस ।

दुलरू दमांद ह वो चिठी ला धर के दुआरी के चउरा मा बईठ के गोहार पार पार के रोवन लागिस । वौखर रोवइ ल सुनके ओखर घर गोसइन ह उत्ता धुर्रा आईस अउ अपन मनखे के हाथ मा कारड ल देखते अपन मनसे ल पोटार के वोखरो ले जोरहा रोवन लागिस ।

इनकर रोवई ल सुनके बनिया के घरवाली घला अपन बेटी दमांद ल पोटार के अपनों रोय लगिस ।

इखर रोवई के आरो पारा परोसी मन ल मिलिस त जम्मो सकलागें । एती बनिया ह घलो अपन घर पहुचिस त अपन दुवारी म जम्मो गांव माई पिल्लां ल देख के कुछु गुने नई सकिस अउ उहू हा बेटी दमांद अउ अपन घरवाली के तीर म बइठ के रोवन लागिस ।

फेर गजब्बे बेरा के रोवई उप्पर बनिया ह अपन घरवाली ले कलु चुप पूछिस, का होगे ओ, हमर उपर काय दुख परे हे ?

बनिया के घरवाली जेखर रोवई म आंखी ह भजिया असन फूलगे रहय, किहिस – में नई जानव ! वो ह अपन बेटी ल पूछिस त उहू किहिस – में नई जानव ! बनिया के बेटी ह अपन मनसे ले पूछिस त अपन हाथ के चिठी ल दे देइस ।

जब बनिया ह देखिस त ए उही कारड रहय जेला वो ह परदेस ले भेजे रहिस । वो ह अपन दुलरू दमांद ले पूछिस, कसरे बाबू एमा काय लिखे हे जउन ला पढ के तैं जम्मो गांव घर मा रोवई के ओरा बहादेस ।

दमांद बाबू ह किहिस, मे ह अपन करनी के दुख म रोवत रेहेंव । पढे लिखे के दिन मां पढेव निही । जम्मो घर के मन पढे बर जोजियांवय फेर में ह गुल्ली डंडा, डंडा पचरंगा खेल के गंवा देंव । आज जब हरकारा कका ह मोला चिठी देके गिस त में एला पढे नइ सकव कहिके रो डारेंव ।

बनिया अउ गांव के जम्मो रहवइया मन ए दुलरू दमांद के गोठ ल सुनके हांसिन फेर यहू गुनिन के गांव मा हमन कोनो ल अपढ अडनिया नई रहन देवन ।




शिव शंकर शुक्ल

धर ले कुदारी

धर ले रे कुदारी गा किसान

आज डिपरा ला रखन के डबरा पाट देबो रे ।

ऊंच-नीच के भेद ला मिटाएच्च बर परही

चलौ चली बड़े बड़े ओदराबोन खरही

झुरमिल गरीबहा मन, संगे मां हो के मगन

करपा के भारा-भारा बाँट लेबो रे ।

चल गा पंड़ित, चल गा साहू, चल गा दिल्लीवार

चल गा दाऊ, चलौ ठाकुर, चल न गा कुम्हार

हरिजन मन घलो चलौ दाई - दीदी मन निकलौ

भेदभाव गड़िया के पाट देबो रे ।

जाँगर पेरइया हम हवन गा किसान

भोम्हरा अऊ भादों के हवन गा मितान

ये पइत पथराबन, हितवा ला अपन हमन

गाँव के सियानी बर छाँट लेबो रे ।



कवि मुकुन्‍द कौशल

मोर भाखा

मोर भाखा सँग दया मया के सुग्घर हवै मिलाप रे ।

अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा, कऊनो सँग झन नाप रे ।।

येमा छइहाँ बम्हलई देबी, बानबरद गोर्रइयाँ के

देंवता धामी राजिउलोचन सोमनाथ जस भुँइया के

ये मां हावे भोरमदेव जस, तीरथ के परताप रे ।

अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा, कऊनो सँग झन नाप रे ।।


दमऊ खँजेरी तबला ढोलक नंगाड़ा दमकै येमां

हरमुनिया करतार तमूरा मंजीरा छमकै येमां

मोहरी के सुंदर अलाप येमां दफड़ा के थाप रे ।

अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा, कऊनो सँग झन नाप रे ।।

करम-धरम के राग-पाग मां फींजे कथा कहानी हे

बोलत बेरा लगथे जइसे ये गीता के बानी हे

गुरतुर भाखा मां, गाना के, गूँजत रथे अलाप रे

अइसन छत्तीसगढ़िया भाखा कऊनो संग झन नाप रे ।।



कवि मुकुन्‍द कौशल

तैं ह आ जाबे मैना

तैं ह आ जाबे मैना

उड़त उड़त तैंह आ जाबे ।

मैंह कइसे आवौं ना, मैंह कइसे आवौना,

बिन पाँरवी मोर सुवना कइसे आवौं ना

मन के मया संगी तोला का बताववं ना

तैंह आ जाबे मैना,

उड़त उड़त तैह आ जाबे ....


पुन्नी के रात मैना चंदा के अँजोर

जुगुर-जागर चमकत हे गाँव के गली खोर

सुरता आवत हे तोर अँचरा के छोर

तैंह आ जाबे मैना,

उड़त उड़त तैह आ जाबे ....

पुन्नी के अँजोर सुवा बैरी होगे ना

दूसर बैरी मोर पाँव के पैरी होगे ना

छन्नर-छन्नर पैरी बाजय कइसे आवौं ना

मन के मया संगी तोला का बताववं ना ....

लहर-लहर पुरवाही झूमर गावै गाना

झिंगुर आभा मारै मोला, कोइला मारै ताना

मया मां तोर मैं बिसरायेवं अपन अऊ बिराना

तैंह आ जाबे मैना,

उड़त उड़त तैह आ जाबे ....



कवि मुकुन्‍द कौशल

जागरण गीत

भाई समीर यादव जी ह हमर धरती के मया म सुकवि बुधराम यादवजी के ये जागरन गीत गुरतुर गोठ के संगी मन बर भेजे हे । जागौ किसान जागौ जवान हमर छत्‍तीसगढ अब गोहरावत हे :-



जागरण गीत
मालिक बन गयं नौकर भैया
ऊंच हबेली के रहवैया !
हमरे घर ले हमला धकियावत हें
अब तो जागव छत्तिसगढिहा मन
मौउका ये हाथ ले गवावंत हे !!

लोटा धर के आइन जेमन
हो गयं सेठ महाजन
धान कटोरा सजाइन तेमन
हो गयं भाट अउ मांगन
हमर ओरिया घाम घलाईया
हमर देहे ला खवईया
हमरे बर कुकुर कस गुर्रावत हें !
अब तो जागव छतीस..............
हमर सत इमान धरम के इन होगें बयपारी
होत बिहनिया झाँकत हावन
इंखर हम दुवारी इन भाइन खुर्सी बैठवैया
हमन टहल के बजवैया
हुकुम हमर ऊपर इन चलावत हें !
अब तो जागव छतीस ......
दिन मा दू रात मा चार महल इन सिर्जाथें
हमर छानी-परवा उघरा भितिया अउ भहराथे
हितवा बन के बिष देवइया
जोंक जनव ये लहू पिवईया
हमर आन्छत इन मजा उड़ावत हें
अब तो जागव छतीस.....
घर आये पहुना कस सुघर उंच पीढा बैठारेन
अपन पेट के बाना मार के इन्कर पेट मा डारेन
खाके पतरी छेदा करइया
बाहिर डेहरी के बैठिया
घर मा हमर दवां ये बगरावत हें !
अब तो जागव छतीस ....
का गुन मा थोरे कउनो ले का बल के हम हीन
बीत गे ओ समे जवंरिहा फिर गय अब ओ दिन
ये भुइंया के सेवा बजैया
छत्तीसगढ़ ला मोर कहईया
पार बांधव पानी अब बोहावत हे !
अब तो जागव छत्तीसगढ़ मन
मौका ये हाथ ले गवावंत हे .......!
.......... रचनाकर ........
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर



....................... परिचय...............



......................बुधराम यादव ............



पिता का नाम - श्री भोंदू राम यादव



पत्नी - श्रीमती कमला देवी यादव



जन्मतिथि - 3 मई 1946



पता - ग्राम खैरवार (खुर्द) तहसील-लोरमी, जिला-बिलासपुर, छत्तीसगढ़.



शैक्षणिक योग्यता - सिविल इंजीनियरिंग में पत्रोपाधि अभियंता



साहित्यिक अभिरुचि - गीत एवम कविता लेखन छत्‍तीसगढी एवम हिंदी में, सतसाहित्य अध्ययन चिंतन और गायन



कृतियाँ - काव्य संग्रह " अंचरा के मया " छत्‍तीसगढी गीत एवम कविता संग्रह प्रकाशित



प्रकाशन एवम प्रसारण - वर्ष 1966-67 से प्रयास प्रकाशन बिलासपुर से प्रकाशित काव्य संग्रह 'खौलता खून', मैं भारत हूँ, नए गीत थिरकते बोल, सुघ्घर गीत एवम भोजली आदि में रचनाएँ प्रकाशित हुई . इनके अतिरिक्त अन्य आंचलिक पत्र पत्रिकाओ एवम काव्य संग्रहों में भी रचनाओं का प्रकाशन होता रहा है. आकाशवाणी तथा गोष्ठी एवम कवि सम्मेलनों के माध्यम से भी निरंतर साहित्य साधना करते रहें हैं.



सम्प्रति - अभियंता के पद पर विभिन्न स्थानों में शासकीय सेवा करते हुए साहित्य साधना में सक्रिय रहे, वर्तमान में पद से सेवानिवृत होकर बिलासपुर में सक्रिय.



वर्तमान पता - एम.आई.जी. /8 चंदेला नगर रिंग रोड क्र. बिलासपुर, छत्तीसगढ़


महर महर महकय माटी



............महर महर महकय माटी.........


महर महर महकय माटी मोर लहर लहर लहरावय धान !

खेत मेढ़ मा ठाढे मगन मन मुचुर मुचुर मुसकावय किसान !!
जुरमिल बेटा-बहु सुवारिन

खेत के बन-कचरा निरवारिन !

जईसे जिनगी के गुन अवगुन

निरवारय कोई चतुर सुजान !!

महर महर महकय माटी मोर,
लहर लहर लहरावय धान !
झिमिर झिमिर बादर बरसय

धरती के चारों खुंट सरसयं !

सुध बुध बिसरे बांचय दादुर

जस के जानव पोथी पुरान !!

महर महर महकय माटी मोर,
लहर लहर लहरावय धान !
सुरूर सुरूर पुरवैया डोले

खर खर धान के पाना बोलय !

चिरईं चुरगुन जमो खार के

जुरमिल जनव मिलांवय तान !!

महर महर महकय माटी मोर,
लहर लहर लहरावय धान !
मेहनत के फल समुनहे पाके

तन मन के सब दुःख बिसराके !

चोंगी मा माखुर भर आगी

चकमक मा सुलगावय मितान !!

महर महर महकय माटी मोर,
लहर लहर लहरावय धान !
कनिहा मा ओठ्गाये तुतारी

धरे खांध मा रांपा कुदारी !

अलबेला अलखावत गावय

मोर धरती मोर जीव परान !!

महर महर महकय माटी मोर,
लहर लहर लहरावय धान !
महर महर महकय माटी मोर लहर लहर लहरावय धान !

खेत मेढ़ मा ठाढे मगन मन मुचुर मुचुर मुसकावय किसान !!


..................
रचयिता..

......
सुकवि बुधराम यादव..

..........
बिलासपुर..
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....................... परिचय...............



......................बुधराम यादव ............



पिता का नाम - श्री भोंदू राम यादव



पत्नी - श्रीमती कमला देवी यादव



जन्मतिथि - 3 मई 1946



पता - ग्राम खैरवार (खुर्द) तहसील-लोरमी, जिला-बिलासपुर, छत्तीसगढ़.



शैक्षणिक योग्यता - सिविल इंजीनियरिंग में पत्रोपाधि अभियंता



साहित्यिक अभिरुचि - गीत एवम कविता लेखन छत्‍तीसगढी एवम हिंदी में, सतसाहित्य अध्ययन चिंतन और गायन



कृतियाँ - काव्य संग्रह " अंचरा के मया " छत्‍तीसगढी गीत एवम कविता संग्रह प्रकाशित



प्रकाशन एवम प्रसारण - वर्ष 1966-67 से प्रयास प्रकाशन बिलासपुर से प्रकाशित काव्य संग्रह 'खौलता खून', मैं भारत हूँ, नए गीत थिरकते बोल, सुघ्घर गीत एवम भोजली आदि में रचनाएँ प्रकाशित हुई . इनके अतिरिक्त अन्य आंचलिक पत्र पत्रिकाओ एवम काव्य संग्रहों में भी रचनाओं का प्रकाशन होता रहा है. आकाशवाणी तथा गोष्ठी एवम कवि सम्मेलनों के माध्यम से भी निरंतर साहित्य साधना करते रहें हैं.



सम्प्रति - अभियंता के पद पर विभिन्न स्थानों में शासकीय सेवा करते हुए साहित्य साधना में सक्रिय रहे, वर्तमान में पद से सेवानिवृत होकर बिलासपुर में सक्रिय.



वर्तमान पता - एम.आई.जी. /8 चंदेला नगर रिंग रोड क्र. बिलासपुर, छत्तीसगढ़

संगी-साथी

ब्‍लॉगर संगी