दिवस कहॉं
सूर्य का आलोक है
भोग आरक्षण
सम्मान की विलासिता
सब, तुम्हारे लिये
मेरे लिये तो
बस, जायों को पेट भर रोटी
हिम्मत भर मेहनत
देह भर नेह
इसी में सिमटा
मेरा सारा लोक है
नहीं कर सकती मैं तुम्हारा स्वागत
आंखों में आंसू
अंजुरी में फूल भर कर
तुम्हे मुबारक ये दिवस
और दिवस के लुभावने स्वप्न
मुझे तो बरसों जागते रहना है
स्वप्न को किसी मंजूषा में धर कर.
संजीव तिवारी



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