"कला जानते हो ?"
कैनवास में
तूलिका से आडी तिरछी रेखाओं
के बीच
नारी जननांगों
को उकेरते हुए
उसने मुझसे कहा.
आधे कटे सेव
और
एक जोडी पपीते
के त्रिभुज
से विस्तृत
देह
के चित्र में
मैं, कला खोजने लगा.
पत्थरों में उकेरी प्रतिमायें
स्मृति में
धुऑं धुऑं अस्पष्ट.
"अभिव्यक्ति की आजादी
चाहने वाले लोग
देश की पुलाव में
कंकड की तरह .."
कला ना सहीं
पुलाव खाते हुए
मैं कंकड का
दुख जानता हूँ
खाने में कंकड अच्छे नही लगते.
संजीव तिवारी
(गुगल से साभार विभिन्न चित्रों का कोलाज )


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