'गुरतुर गोठ' www.gurturgoth.com हमार नवा ठीहा

नयना नीर भरे


नयना नीर भरे कोई फिर ना झरे
नाही कोई किसी को छले
आओ सबसे से मिले गले.....
इस चमन में अमन की वो गंगा बहे
जन गण सदियों सलामत औ चंगा रहे
धरा धर्ममय सर्वसम्पन्न जन
भूख भय भेद संत्रास के हो दमन
दिन प्रतिदिन और फूले फले
आओ सबसे मिले हम गले ......

क्रांतियाँ जोड़कर हम शिखर पर चदें
भ्रांतियां तोड़कर हम निखरकर बढ़ें
प्रीति परतीति मन में पिरोते रहें
स्नेह समता समन्वय संजोते रहे
यूँ ही चलते रहे सिलसिले
आओ सबसे मिले हम गले ....

दौर अनचाहे विपरीत जो भी चले
बीज किन्तु विलग के ना कोई पले
यह हमें आस और पूर्ण विश्वास
जमीन एक और एक आकाश हो
खुशियाँ नितनव जहाँ हर पले
आओ सबसे मिले हम गले

नयना नीर भरे कोई फिर ना झरे
नाही कोई किसी को छले......

रचयिता.....

सुकवि बुधराम यादव

4 टिप्पणियाँ:

श्रद्धा जैन August 12, 2008 7:20 PM  

wah kya baat hai aapka blog dekha bhaut achha laga
aapki kavita bhi bhaut pasand aayi
likhte rahe

shrddha

शोभा August 12, 2008 9:18 PM  

क्रांतियाँ जोड़कर हम शिखर पर चदें
भ्रांतियां तोड़कर हम निखरकर बढ़ें
प्रीति परतीति मन में पिरोते रहें
स्नेह समता समन्वय संजोते रहे
यूँ ही चलते रहे सिलसिले
आओ सबसे मिले हम गले .बहुत अच्छा लिखा है। स्वागत है आपका

Udan Tashtari August 12, 2008 10:41 PM  

आनन्द आ गया.बहुत आभार.

राजेंद्र माहेश्वरी August 13, 2008 3:44 PM  

आज परम्परा चालाकी की होती जा रही है | ईमानदारी मे चालाकी नही होती | आज आदमी बुद्धि का प्रयोग कर रहा है | आज संवेदना समाप्त हो गयी | यह परम्परा क्या समाज के हित मे है ? इसके दूरगामी परिणाम देखे तो यह हमारे हित मे नही है |

तो जिस समाज मे इस चालाकी की परम्परा हो जायेगी तो चालाक आदमियों की संख्या समाज मे ९९ प्रतिशत हो जायेगी और और सज्जनों की संख्या १ प्रतिशत होगी तो आप सोचिये की आप १ जगह धोखा दोगे और ९९ जगह धोखा खाओगे | यह फायदे का सोदा नही है | इससे सभी का नुकसान होता है |

Post a Comment

आप मन हमर गुरतुर गोठ म आयेव येखर आप ला बहुत बहुत बधई । .............
खाल्‍हे म देहे डब्‍बा म अपन बिचार अउ सुझाव जरूर लिखहू ........

Custom Search

मोर सोंच मोर छत्तीसगढी

मोर मन हा छत्तीसगढी बोले पढे लिखे म अडबड गदगद होथे, काबर नई जानव ? फ़ेर सोचथो मोर जनम इहि छत्तिसगढ के कोरा मा होये हवय गाव, गौठन, गाडा रावन के धुर्रा संग खेलत औउ ब्यारा के पैरा मा उलानबादी खेलत लईकई बिते हे सुआ ददरिया फ़ाग अउ माता सेवा गात नाचा गम्मत खेलत पढई के दिन बिते हे तेखरे सेती मोर छत्तिसगढ अंतस ले कुहुक मारथे । आघू अउ हे ......

अहिमन कैना : छत्तीसगढी लोक गाथा

सासे के बोलेंव सास डोकरिया कि सुनव सासे बिनती हमार

मोला आज्ञा देतेव सास

कि जातेंव सगरी नहाय

घर हिन कुंवना घर हिन बावली

कि घर हिन करौ असनाद, पूरा गाथा पढौ ........

पागा फोटू बडे भाई अनूप रंजन पाण्डेय के 'बस्तर बैंड'

  © Blogger template 'External' by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP