मुक्तक..


मुक्तक..



पर के पीरा हा जेकर हिरदे मा जनावत हे
पर के पीरा ल जौन अपन कस बनावत हे !
ऐसनहा मनखे, मनुख नोहय देवता ये
पर के पीरा हरत जौन जनम पहावत हे !!




मांगे ले इक घरी ना कौनो उधार देंहय
बुडे जिनगी के डोंगा नई कउनो उबार देंहय !
माउका मिले हे जम्मो बिगडे बना ले संगी
रो रो गोहराबे तभो न कउनो सुधार देंहय !!




सत अउ इमान सही कउनो धरम नइये
अपन बिरान सही कउनो भरम नइये !
पर के हितवा बन के जिनगी पहा ले
'बुध' अइसन गियान सही कउनो मरम नइये !!




रतन अमोल धरे इंहा उंहा भटकत हें
बिरथा बर रात दिन माथा ला पटकत हें !
मरम नई पाइन सिरतो मनुख तन पाये के
सैघो ला छांड तभे आधा मा अटकत हें !!




बूता ओसरावय नहीं एती ओती टारके मा
रस्ता नापावय नहीं मरहा जईसे सरके मा !
सुघर करम के बिन जिनगी महमहावय नहीं
बैरी डरावे नहीं दुरिहा ले बरके मा !!




रचयिता...
सुकवि बुधराम यादव
बिलासपुर.....

1 comment:

  1. aapko aur budhram jee ko swatantrata divas ke gaada-gaada badhai

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संगी-साथी

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