एक नानवेज टाईप पोस्‍ट : क्षमा सहित.

लगभग पांच साल पहले मैं अपने एक होटल प्रबंधक मित्र के साथ मुम्‍बई गया था, हम दोनों को एक कम्‍पनी में काम था। मुझे एक संस्‍था के वाणिज्यिक परिसर में उक्‍त कम्‍पनी के किराये के कार्यालय से संबंधित कुछ कानूनी कार्य था और मित्र को अपने मित्र के परिसर में उस कम्‍पनी के किराये से संबंधित कुछ अन्‍य कार्य था। उस कम्‍पनी के लिए हम दोनों एक दूसरे के पूरक थे इसलिए हम दोनों साथ हो लिए थे। उस कम्‍पनी में लगभग सारे कर्मचारी महाराष्‍ट्र मूल के हैं और उस कार्यालय की बोलचाल की भाषा भी मराठी थी, मित्र मराठी भाषा भासी था, मैं पेशे से अधिवक्‍ता।


खैर काम के सिलसिले में हमें लगभग पांच दिन मुम्‍बई में एक होटल में रहना पड़ा, हमारे इस मित्र को ईश्‍वर नें सौंदर्य का वरदान दिया है जो उसके जाब के लिए बेहद फिट बैठता है, हमेशा टिप टाप रहने वाला हमारा यह मित्र उस समय व्‍यक्तित्‍व विकास का ट्रेनिंग ले रहा था और यंत्रवत व्‍यवहार करता रहता था। वह प्रत्‍येक मिलने वाले व्‍यक्ति पर अपने व्‍यक्तित्‍व का प्रभाव डालने का प्रयास करते रहता था। हम काम निबटाकर होटल में आते और फिर होटल से निकलते तो वह शेव बनाता और चेहरे पर क्रीम आदि लगाता। यह क्रम यदि हम दिन में चार-पांच बार होटल आकर पुन: जाते तो वह करता था, जिसमें से उनका चार-पांच बार शेव करना मुझे अटपटा लगता पर मैं उसके व्‍यक्तित्‍व विकास कार्यक्रम को मुस्‍कुरा कर नमस्‍कार करता था।

काम निबटाकर हम भिलाई आ गए और अपने अपने काम-धाम में लग गए वह नित नई उंचाईयां छूते रहा, समाचार पत्रों में होटल-खान-पान विशेषज्ञ के रूप में उसका फोटो, नाम आदि छपता रहा। ... नगर के सफेदपोश धनाड्यों को खाना-दाना परोसते हुए, उनके रातों को रंगीन करते, करवाते हुए पैसे बटोरते रहा। ... और धीरे धीरे हम अपने आप को उससे दूर कर लिये या उसका व्‍यक्तित्‍व विकास कार्यक्रम के कारण हम दूर कर दिये गए। जो भी हो आज बड़े दिन बाद वह मित्र हमें सड़क पर मिला। बड़ी सी लग्‍जरी कार के शीशे से सिर बाहर निकाल कर  उसने हमें रोका, दुआ-सलाम और काम-धाम की चर्चा के बाद उसने मेरे बढ़ आये दाढ़ी को देखकर कहा 'महराज, आपकी पूरी दाढ़ी पक गई है।' '............. हॉं यार सिर के भी सारे बाल पक गए हैं, यह तो गार्नियर का कमाल है' मैं स्‍वीकृति स्‍वरूप मुस्‍कुराया और अपने सिर के काले बालों को दिखाते हुए कहा।  'तभी आपका दिमाग खूब चलता है बहुत लिखते पढ़ते हो।' उसने कहा। मैंनें उसके क्‍लीन सेव सुदर्शन मुखड़े पर नजर डालते हुए प्रश्‍न किया 'तुम्‍हारे नहीं पके क्‍या' मित्र ठकठकाकर हसने लगा। मैंनें फिर पूछा कि इसमें हसने की क्‍या बात है यार तो उसने मजाकिया लहजे में छत्‍तीसगढ़ी में कहा 'जम्‍मो पाक गे हे, महराज, कहॉं कहॉं के ला बतावंव।' अब ठकठकाके हसने की बारी मेरी थी, 'तभे तोर मशीन खूब चलथे यार।' दोनों के हाथ ताली बजाते हुए मिले और हम देर तक हसते रहे। 
'तुम तो यार पांच बार शेव करते हो, दाढ़ी के साथ 'जम्‍मो' जगह भी शेव कर लिया करो।' मैं मुस्‍कुराते हुए ही कहा। हसने का दौर कुछ देर और चला तब तक पीछे कुछ ट्रैफिक बढ़ गई तो हम दुआ सलाम के साथ अपने अपने रस्‍ते बढ़ गए। 
मैं रास्‍ते में सोंचता रहा, अपने मुखड़े पर आत्‍ममुग्‍ध, वियाग्रा की नियमित डोज लेने वाले, पांच बार शेव करने वाले इस व्‍यक्ति (मित्र) को कहां कहां रेजर घुमाना पढ़ता होगा ना ..... और इसे इसके लिए समय भी मिल जाता है। 

जय हो दुनिया और दुनियादारी. 
  
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5 टिप्पणियाँ:

  1. दुनिया रंग रंगीली .

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  2. मधुमक्खी ढूढ़े सुमन को, मक्खी ढूढ़े घाव,
    अपनी अपनी प्रकृति है, अपना अपना चाव।

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  3. बड़ी दुनियादार पोस्ट है ! शेविंग तो शेविंग है इस में नानवेज कैसा :)

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  4. फ़ोटो मन कहां चल दिस गा?
    बने जय-विजय असन दिखत रहिस।
    वहा दे आगे फ़ोटो हां।
    जोहार ले-साहेब बंदगी साहेब

    संडे का फ़ंडा-गोल गोल अंडा

    ब्लॉग4वार्ता पर पधारें-स्वागत है।

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  5. अली साब हमारे पंडित जी के संस्कार क्या बात है वाह ऐसे तथ्यों को सादगी से उज़ागर करने का हुनर उनने ही पाया है वाह

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