कृष्ण ने कहा था .... ब्‍लॉगिंग जूतमपैजार के संदर्भ में. .. ?

कृष्ण ने कहा,

'मेरा अभी एक काम शेष है। ये यदुवंशी बल-विक्रम,वीरता-शूरता और धन-संपत्ति से उन्मत्त होकर सारी पृथ्वी ग्रस लेने पर तुली हैं। यदि मैं घमंडी और उच्छृंखल यदुवंशियों का यह विशाल वंश नष्ट किए बिना चला जाऊंगा तो ये सब मर्यादाओं का उल्लंघन कर सब लोकों का संहार कर डालेंगे।'

अंत में कृष्ण के परामर्श से सब प्रभासक्षेत्र में गए। वहां मदिरा में मस्त हो एक-दूसरे से लड़ते 'यादवी' संघर्ष में वे नष्ट हो गए।

श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह चौधरी जी के ब्‍लॉग से साभार

सरकारी हिंसा से सिविल सोसायटी के सवाल - लेखमाला : कनक तिवारी

छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित साप्‍ताहिक पत्रिका इतवारी अखबार में छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता, गांधीवादी चिंतक, साहित्‍यकार, वक्‍ता श्री कनक तिवारी जी के दस लेखों को संकलित कर प्रकाशित किया गया है। हम अपने पाठकों के लिए उन लेखों का लिंक घुरूवा में प्रस्‍तुत कर रहे हैं -












सर्च इंजन से 'मसाज', 'लाल किताब' और 'सेक्‍स' खोजते ब्‍लॉग पर आते हुए लोग

अंग्रेजी भाषा में टाप सर्च वर्ड जैसे ढेरों सुझाव नेट पर उपलब्‍ध हैं, ऐसे समय में जब वरिष्‍ठ ब्‍लॉगरों के द्वारा ब्‍लॉगिंग सम्‍मेलन बुलाए जाने के स्‍थानों की सूची बनाई जा रही है. हिन्‍दी में सेक्‍स और अश्‍लीलता से परे टाप सर्च वर्ड और क्‍या-क्‍या हैं इसकी सूची भी अब बननी चाहिए.

हमने अपने ब्‍लॉग आरंभ में आज अपनी मति अनुसार, बहुत खोज बीन कर, श्रम करके एक पोस्‍ट - कवि गोपाल मिश्र : हिन्‍दी काव्‍य परंपरा की दृष्टि से छत्‍तीसगढ़ के वाल्‍मीकि पब्लिश की है, सामान्‍य ब्‍लागरी उत्‍सुकता एवं किंचित समय की उपलब्‍धता के कारण हम उस पोस्‍ट में आ रहे ट्रैफिक को जानने के लिए फीडजिट पर नजरें गडाए बैठे रहे तो बहुत रोचक जानकारी हमें प्राप्‍त हुई.

ब्‍लागवाणी व चिट्ठाजगत से आ रहे पाठकों के अतिरिक्‍त, सर्च इंजनों से भी ट्रैफिक हमारे ब्‍लॉग में आ रही थी. जिस पोस्‍ट में सर्च इंजन के द्वारा ट्रैफिक आ रही थी वह पोस्‍ट थी 'मसाज पार्लर : जहां लड़कियां मसाज करती हैं.फीडजिट के दस परिणामों में से चार क्लिक इस पोस्‍ट के लिए थे यानी चालीस प्रतिशत ट्रैफिक 'मसाज' शव्‍द खोजते हुए हमारे ब्‍लॉग तक पहुच रहे हैं .... और हम नाहक ही दूसरे विषयों पर कलमघसीटी कर, चार-चार पेजों को सीमित समय के बावजूद टाईप कर, ब्‍लॉग में पब्लिश कर रहे हैं :)

बुद्धिजिवियों, बनवारीलालों, घीसूलालों जैसों की ब्‍लॉगप्रसिद्धि और टिप्‍पणियों के जूतमपैजारों के सुख से वंचित ना रहना पडे सोंचकर ही हमने इस ब्‍लॉग को बरकरार रखा है, हालांकि इसमें सर्च इंजन से कुत्‍ता भी मूतने नहीं आता, घुरूवा की औकात बनी रहे :)

आपके ब्‍लॉग पर सर्च इंजन के माध्‍यम से किस शव्‍द को खोजते हुए लोग आ रहे है .... हमें भी बतायें

हम अच्छा पढने और अच्छा लिखने में ध्‍यान नहीं लगाते : जनाब हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत नें हमें कहा

कल हमारे पोस्‍ट टिप्पणी पाने की दृष्टि से हम क्षुद्र ब्लोगर हैं में एक हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत नाम के श्रीमान जी, जो अपना नाम हिन्‍दी में नहीं अंग्रेजी में लिखते हैं, पधारे और अपने टिप्‍पणी से हमें कृतकृत कर दिया. जनाब नें हमें बतलाया कि हम अच्छा पढने और अच्छा लिखने में ध्‍यान नहीं लगाते. सिर्फ वे ही हैं जो अपने ब्‍लॉग में सौ टाप हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के लिंक लगाकर रोज सुबह अगरबत्‍ती धूप देकर हनुमान चालीसा जैसे पढ़ते हैं. बाकी सब तो अच्छा पढने और अच्छा लिखने में ध्‍यान ही नहीं लगाते बल्कि फालतू बातों की बातों की ओर अपना ध्‍यान लगाते हैं. उन्‍होंनें आगे यह भी कहा है कि हम अपने समय और रचनात्मकता का बेहतर सदुपयोग भी नहीं करते.

आपको छोड़कर क्‍या चौदह हजार हिन्‍दी ब्‍लॉगर्स यही सब कर रहे हैं .............. ? 

महफ़ूज भाई हमारे साथ हैं -




 

टिप्पणी पाने की दृष्टि से हम क्षुद्र ब्लोगर हैं

धान के देश वाले युवा हृदय सम्राट जी.के. अवधिया जी नें अपने एक पोस्‍ट में हिन्दी ब्लोगिंग के अपने तीन साल के अनुभव को हम सबसे शेयर किया है. जिसके अनुसार 'हिन्दी ब्लोगिंग का तो उद्देश्य है महान ब्लोगर बनकर अन्य ब्लोगरों से सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त करना। अतः सफल ब्लोगर वे ही होते हैं जिन्हें सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त होती है।'

उन्‍होंनें लिखा है कि 'महान ब्लोगर वे होते हैं जो हिन्दी ब्लोगिंग के उद्देश्य एवं लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहते हैं और यह तो आप जानते ही हैं कि हिन्दी ब्लोगिंग का उद्देश्य न तो रुपया कमाना है, न अपने मातृभाषा की सेवा करना और नेट में उसे बढ़ावा देना है और ना ही पाठकों को उसके पसन्द की जानकारी ही देना है '

गुरूदेव के दोनों बातों पर मैं यहां चर्चा कर लेना चाहता हूं. हमारा पहला उद्देश्‍य एडसेंस से पैसा कमाना था सालों से कमाने का भ्रम बनाये गूगल बाबा नाराज हो गए और अब कमाई का भूत गायब हो गया है. दूसरा कि मातृभाषा छत्‍तीसगढ़ी की सेवा करने का भ्रम पालते हुए नेट में कुछ डाटा अपलोड कर दें पर पाठकों को इससे कोई लेना देना नहीं, दूसरी प्रादेशिक व क्षेत्रीय भाषा के ब्‍लागों में पाठक नजर आते हैं पर हमारी भाषा ब्‍लॉगजगत में सबसे गरीब है. (सुना है छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लॉगरर्स हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में धूम मचा रहे हैं.)

हम अपने हिन्‍दी ब्‍लॉग आरंभ से संतुष्‍ट हैं, यद्धपि वहां भी टिप्पणी पाने की दृष्टि से हम क्षुद्र ब्लोगर हैं. हम क्षुद्र ही सही. क्षुद्र होने के बहुत से फायदे हैं.

लाली देखन मैं चली, जित देखूँ तित लाल : कुमार ज़लज़ला


आज दिल्‍ली में आयोजित ब्‍लॉगर्स मिलन में पिक्‍चर स्‍टाईल में कुमार ज़लज़ला के आने की संभावना को देखते हुए उदय जी के पोस्‍ट में अमर कुमार जी नें टिप्‍पणी की है जिसमें सभी मिलने वाले ब्‍लागरों से उन्‍होंनें अपील की है कि वे सभी लाल टी शर्ट में सम्‍मेलन स्‍थल पर उपस्थित हों. आप भी देखें -


यदि महाशय प्रगट भी हो जायेंगे, तो क्या उपस्थित ब्लॉगर्स को दर्शन लाभ से मोक्ष मिल जायेगा ?
न जाने क्यों सिनिकल माइँड के एक स्पिल्ट परसॉनेलिटी को इतना महत्व दिया जा रहा है ?
अगर मेरी मानिये तो सभी लोग लाल टी-शर्ट पहन कर जायें ।
वह दिग्भ्रमित होगा और आप सब भी,
" लाली देखन मैं चली, जित देखूँ तित लाल " की जद्दोजहद से बच जायेंगे !

ब्‍लॉगर नें शुरू की प्रीव्‍यू की नई सुविधा

ब्‍लॉगर नें पोस्टिंग पेज में आज से नई प्रीव्‍यू की सुविधा प्रदान की है जो पोस्‍ट खाने के नीचे पब्लिश और सेव के ठीक बाजू में बटन के रूप में उपलब्‍ध है। पोस्‍ट लिखने के बाद यदि आप इसे क्लिक करेंगें तो पोस्‍ट के कंटेंट एक नये विंडो में खुलता है और हमारे ब्‍लॉग टैम्‍पलेट में उसी प्रकार दिखने लगते हैं जैसे पोस्‍ट होने पर दिखेंगा.

आप स्‍वयं उपयोग कर देखें.

फिलहाल विदा .....

समृद्धि ही बस्तर के लिए अभिशाप : आशा शुक्‍ला

लंबे प्रवास से लौटने के बाद जो सबसे सुखद खबर मिली वो ये थी कि नारायणपुर जिले के नारायणपुर ब्‍लाक से मात्र ५ किलोमीटर पर बसे गांव बिंजली में पहुंचमार्ग पक्‍का बन गया है, क्‍योंकि सरकार वहां पहुंची। तुम्हारे माध्‍यम से 'सरजी’ को धन्‍यवाद। नारायणपुर से ऐड़का-धनोरा होते हुए केशकाल मात्र १०५ किलोमीटर दूर जबकि नारायणपुर से अंतागढ़-भानुप्रतापपुर से कांकेर होते हुए केशकाल १५५ कि.मी. यानी १६ लीटर डीजल कुल ६४० रुपए का। दूसरा मार्ग नारायणपुर से कोंडागांव होते हुए केशकाल ११० कि.मी. ११ लीटर डीजल ४४० रुपए। ये मार्ग ठीक है मात्र ५ कि.मी. …यादा परंतु उस मार्ग के बन जाने से अंदर के गांव जो मैंने एक नक्‍शे के माध्‍यम से दर्शाए हैं नारायणपुर जिला मुख्यालय और रास्ते के बनने से ढेरों लाभ हैं। बाजार, शिक्षा, स्वास्‍थ्‍य, पर्यटन के अलावा दिलों की दूरियां भी कम होंगी। इस पूरे क्षेत्र में पक्की सड़कों का होना जरूरी है। सिर्फ इच्‍छाशक्ति और ईमानदारी की जरूरत है। भानुप्रतापपुर से अंतागढ़ की सड़क इतनी बेहतरीन चौड़ी और शानदार है कि इस पर जाते समय हमेशा लगता है कि सफर खत्‍म ही न हो, सड़क के दोनों किनारों पर साल का बहुत सुंदर जंगल है। एक खूबसूरत नदी जिसका नाम है मेढ़की। बहुत पूछा- किन्‍तु कोई नहीं बता पाया कि इस नदी को ये नाम क्‍यों मिला। ये पूरा इलाका न केवल दर्शनीय है वरनसंसाधनों से भरपूर भी है।

आज अच्‍छी बातें करने का मन कर रहा है। अंतागढ़ से नारायणपुर तक का पूरा इलाका शासन के नक्‍शं में बहुत संवेदनशील माना जाता है और इतिहास में भी। ताड़ोकी से राजा कालेन्‍द्र ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था और यही पैदा हुआ था जननायक गुंडाधुर। इसी गांव बिंजली में १९३२ में आए थे प्रसिद्ध मानव शास्‍त्री वेरियर एल्विन। आज भी बिंजली स्थित हाईस्कूल में उनके हाथों से लगाया गया आम का विशाल पेड़ तन कर खड़ा है, जिसे लोग प्‍यार से 'साहब भरका’ (साहब का आम पेड़) कह कर बुलाते हैं। पता नहीं अपने प्रवास के दौरान 'सरजी’ ने वो पेड़ देखा या नहीं।

इसी गांव में एल्विन लंबे समय तक रहे थे और आदिवासी जनजीवन का गहन अध्‍ययन
कर कुछ विश्व प्रसिद्ध किताबें लिखीं थीं, जिनका अब हिंदी में अनुवाद भी उपलब्‍ध है। नारायणपुर के प्रसिद्ध मेले की तो आज भी चर्चा होती है परंतु अब पूरी तरह से चौपट हो गया है। यहीं बनेगी बहुचर्चित रावघाट रेल लाइन, जिसे अब हरी झंडी मिल गई है, लाल झंडों के हामी भरने से। क्षेत्र का विकास होना चाहिए। संसाधनों का दोहन भी परंतु स्थानीय लोगों की भावनाओं और सम्मान का पूरा ख्याल रखते हुए उन्‍हें मुख्यधारा में लाने से पहले उनकी तैयारी जरूरी है और इसके हजारों विकल्प हैं सिर्फ उन्‍हें बेदखल करना नहीं। आज इस पूरे इलाके में शिक्षा, कृषि और रोजगार के नये आयामों के प्रति लोगों में न केवल जानने-सीखने की ललक है वरना लगातार वो प्रयासरत हैं।

बताओं कौन नहीं चाहता सुख-शांति और समृद्धि भरा जीवन? इसलिए जब हम गांवों में बैठते हैं तो उनकी उर्जा व हसरतें देख-सुन दंग रह जाते हैं, बिंजली गांव का एक युवा आदिवासी लड़का जगदलपुर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। आदिवासी समुदाय भी अब शिक्षा के महत्‍व को समझ गया है परंतु आज भी जानकारियों का अभाव है, इसके लिए पूरा प्रशासकीय तंत्र जिम्मेदार है, हम सब कुछ क्‍यों छुपाना चाहते हैं और किससे, क्‍यों हम इतना महसूस करते हैं? इन सारे सवालों के जवाब स्वयं हमारे पास हैं परंतु हम अपने आप से ही सवाल करने से डरते हैं, इसलिए कभी-कभी लगता है कि लोगों की संवेदना को जगाना भी एक सामूहिक जिम्मेदारी है और हमारे जैसे लोग नाउम्मीद नहीं होते। बस्तर के प्रति प्रदेश के लोगों को संवेदनशील होना ही पड़ेगा और इसके हजारों तरीके हैं।

उसमें से एक तरीका है मैं लिख रही हूं। और तुम छाप रहे हो। चालीस-पचास साल पहले जिस तह से हम प्रकृति को बनते हुए देख सकते थे, वैसे ही आज रावघाट और कांगेरघाटी में देख सकते हैं। चारों तरफ नीलाभ लौह अयस्क के पहाड़ जिन पर लगे साल वन ने भी लोहे की प्रचुरता के कारण अलग रंग धारण कर लिया है पास में अनवरत बहने वाला जल स्‍त्रोत जिसका ठंडा पानी पीते ही लगता है किसी ने लोहे का शर्बत पिला दिया है, चारों तरफ ऐसी वनस्पतियां जिन्‍हें पहली बार देखा था और बाहर की दुनिया में उनकी (वनस्पतियों) रिश्तेदारियां तलाश रही थी कि हमारे पथ प्रदर्शक ने बताया गत चुनाव के दौरान यहां चार माओवादियों को लाकर पुलिस ने गोली मार दी, बस मन तिक्क हो गया कहीं पुलिस ने मारा, कहीं माओवादियों ने, लगने लगा फिर मेरे चारों तरफ रक्त की गंध हवा में घुल गई है। बस्तर की समृद्धि ही उसके लिए अभिशाप बन गई है शायद ये उसके जन्‍म के साथ ही जुड़ा है। अस्सी-नब्‍बे बरस के बीजू ने एक दिन बातों ही बातों में बताया कि वो बचपन में ही अनाथ हो गया था।

इधर-उधर भटकता वो इस गांव में आ गया (आज भी जहां वो रह रहा है) इसी गांव से थोड़े आगे न नदी से थोड़ा पहले अंग्रेजों ने अपना एक डेरा बनाया था, उनके साथ फौज की पूरी एक टुकड़ी थी। अंग्रेज उसे पकड़कर इस कैंप में साफ-सफाई करने व बर्तन आदि धोने के लिए ले गए, बीजू उस समय महज तेरह-चौदह साल का था। एक तो बेरोजगार ऊपर से लड़कपन और गोरों को पास से देखने का शौक बीजू इस कैंप में काफी दिनों तक टिका रहा। इस कैंप में एक युवा अंग्रेज था जो सबसे रौबीला व सजीला था पर थोड़ा
सनकी। उसकी शादी होने वाली थी और उसने अपनी होने वाली वधू से वादा किया था कि वो शादी में शेर की खाल से बना कोट और पैंट पहनेगा।

बीजू दुखी होकर बताता है कि उसकी इस सनक के कारण कई शेर मारे गए और उनकी खाल यहीं तैय्यार की गई। उस अंग्रेज ने शादी में शेर की खाल से तैयार किया गया लिबास पहना, शादी के बाद वो अपनी 'मेम’ को लेकर आया। यह पूछने पर कैसी थी? इतने सालों बाद भी बीजू उसे (मेम) याद कर शरारत से मुस्कुराने लगता है परंतु वो यह भी कहने से चूकता नहीं कि अंग्रेज बहुत कठोर और लुटेरे थे। उसका कहना है कि उसी समय से जंगल कटना शुरू हुआ और वन्‍य जीवों को मारा गया। बीजू बताता है कि वो लोग (आदिवासी) उन्‍हीं शेरों को मारा करते जो पालतू जानवरों या मनुष्यों पर हमला करते। बीजू कहता है कि वो (शेर) अपना चारा खाता है। इस पूरे क्षेत्र में बीजू जैसे गिने-चुने ही लोग बचे हैं जिनकी यादों में समृद्ध बस्तर बसा है।

बस्तर तो आज भी समृद्ध है, हम ही लालची और कंगाल हो गए हैं, हमारी क्षुधा ही अंतहीन हो गई है, इस क्षुधा पर कठोरता के साथ नियंत्रण जरूरी है। बस्तर के विधायकों व सांसदों को सही तरीके से जनता के प्रतिनिधि होने की जिम्मेदारी निभाना चाहिए, इतना तो वो लोग कर ही सकते हैं कि यहां जो भी विकास कार्य चल रहे हैं उनकी सतत् निगरानी व समीक्षा करें भ्रष्ट व चाटुकार और बरसों से यहां जमें अफसरों की ससम्मान बिदाई करें। माओवादियों की आड़ लेकर जो कर्मचारी, ठेकेदार भ्रष्टाचार व कामचोरी कर रहे हैं उनसे सख्ती से व्यवहार करें। पंचायत चुनाव के बाद जो छुटभैय्ये नेता वसूली करते घूम रहे हैं उनके लिए तरीके से व सम्मानजनक ढंग से रोजी-रोटी की व्यवस्था कर दें, क्‍योंकि पंच-सरपंचों से ऐसी लगातार शिकायतें मिलती है, जनता भी लगातार समझदार होते जा रही है, दोनों तरफ से बंदूक की सुरक्षा लेकर लोकतंत्र को बचाया नहीं जा सकता।

आशा शुक्‍ला
(लेखिका लंबे समय से छत्‍तीसगढ़ में पत्रकार के रुप में काम कर चुकी हैं। इन दिनों कांकेर में रहकर वे सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रही हैं)

आलेख छत्‍तीसगढ़ से एवं फोटो रूपेश वर्मा जी से साभार

वे नहीं जानते थे कि उनकी इस कदर मट्टी पलीद की जाएगी : हिन्‍दी ब्‍लॉग विवाद

'मैं भी कहूँगा कि उनकी यह पोस्ट निहायत ही गैरज़रूरी थी' मैं नहीं कोई गुमनाम ब्‍लॉगर जिनके ब्‍लॉग का नाम ही हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत है, ने ताजा ज्ञानदत्‍त जी के पोस्‍ट पर उठे हिन्‍दी ब्‍लॉग भूचाल  के संदर्भ में कहा है। उन्‍होंनें आगे कहा है 'उनसे गलती हुई जो वे यह कह बैठे. गलती सभी करते हैं और गलतियाँ करना कोई अपराध नहीं है. वे नहीं जानते थे कि उनकी इस कदर मट्टी पलीद की जाएगी.' उनके उस पोस्‍ट की कुछ और झलकिंयां देखें  -

'एक साहब लिखते हैं कि ज्ञानदत्त जी के पास अब विषयों की कमी हो गयी है. अब आप यह तय करेंगे कि किसकी ट्यूब में कितनी हवा बची है? आपने खुद आज तक कितनी यादगार पोस्टें लिखीं हैं? कान में हैडफोन लगाकर अपने-अपनों को रेवड़ी बांटना ही शोभा देता है आपको.

'उनका विरोध इस हद तक है कि कुछ को उनके चेहरे तक से एलर्जी है. कैसे आप किसी की फोटो, मुखमुद्रा, भाव-भंगिमा का मजाक उड़ा सकते हैं. किसने आपको यह हक दिया है? कौन मानसिक दीवालियापन दिखा रहा है? आप या ज्ञानदत्त जी?'

'ब्लौग जगत के स्वार्थी राजकुमारों, ढपोरशंखों, और घटोत्कचों - कुछ ऐसा करो जिससे तुम्हें भी अच्छा लिखना और तुलनात्मक आलोचना करना आये और सभी तुम्हारे लिखे को सराहें. अच्छा लिखोगे तो चर्चा भी होगी, टिप्पणियां भी आयेंगी. ज्ञानदत्त जी का नाम लेखर ही तुम लोगों ने अपने कैरियर की सबसे महत्वपूर्ण पोस्ट तो लिख ही ली है. अब हिंदी ब्लौगिंग के इतने सम्माननीय ब्लौगर पर कीचड मत उछालो. तुम लोगों जैसी थू-थू करती पोस्टें लिखने के लिए मुझे तो सचमुच बहुत जाहिल और नाकारा ही होना पड़ेगा. जलो मत, बराबरी करो.

ज्ञानदत्‍त जी की तरफ से सफाई देते हुए वे कहते हैं - 
'कुछ पोस्टें केवल इसी बिंदु पर आधारित है कि ज्ञानदत्त जी ने समीर जी को नीचा दिखाया है, यही न? आप गौर से उनकी पोस्ट को पढ़ें. उसमें दो प्रतिष्ठित ब्लौगरों की ब्लौगिंग और उनकी सामाजिक छवि की बहुत कसावट भरी सकारात्मक आलोचना-तुलना है. उसमें किसी को नीचा दिखाने का भाव नहीं है. कहीं पर भी यह नहीं कहा गया है कि समीर लाल अनूप शुक्ल के सामने कुछ भी नहीं हैं. यदि एक बिंदु समीर लाल का मजबूत है तो दूसरा कमज़ोर भी है. यही बात अनूप शुक्ल के साथ भी है.

है बातों में दम - 
'असल बात जो आपको खटक रही है वह है 'ज्ञानदत्त जी की पोस्टों की उत्कृष्टता और उनकी पोस्टों की लोकप्रियता/पठनीयता' जिसको आपका लेखन कौशल सब कुछ करने पर भी छू तक नहीं सकता. जलते हैं आप ज्ञानदत्त जी से. उन जैसा लिखनेवाले से जलन होना स्वाभाविक है. मुझे तो उनके लेखन से जलन होती है.
 अंत में वे ब्रह्मा विष्‍णु महेश से विनयवत कहते हैं -  हे .....
'समीर जी, आपकी, अनूप जी की, और ज्ञानदत्त जी की चुप्पी शालीन है पर चारों तरफ से दरबारियों और विदूषकों का शोर अभी तक सुनाई दे रहा है.'

महोदय, आप स्‍वयं, आपके ये त्रिदेव, 'चारो' लोक के दरबारी और विदूषक सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हो, क्‍योंकि त्रिदेव में आपसी तौर पर कोई मतभेद है ही नहीं, एक सामान्‍य ब्‍लॉगर को इन सबसे कोई लेना देना ही नहीं कि कौन ब्रह्मा कौन विष्‍णु और कौन महेश और कौन देवाधिदेव. 

रही बात मेरी तो मैं ज्ञानदत्‍त जी के ब्‍लॉग का फीड सब्‍सक्राईबर हूं, उनके पोस्‍टों को सब्‍सक्राईब इसीलिए किया कि मैं उन्‍हें पढ़ना पसंद करता हूं.  और मेल से पढने पर टिप्‍पणियों को पढ़ना नहीं पड़ता. मुझे तो लगता है कि ये टिप्‍पणियां ही ऐसे विवादों और चाटूकारों को बढ़ाती हैं . 

छत्तीसगढ़ के बुध्दिजीवियों को आह्वान

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने दो दिन पूर्व दिल्ली के एक कार्यक्रम में कहा कि नक्सल समस्या पर चुनाव आयोग या किसी निष्पक्ष संस्था से पूरे राज्य में जनमत संग्रह करवा लिया जाए। कल उन्होंने फिर कहा कि शांतिवार्ता की बात जो बुध्दिजीवी कर रहे हैं वे ही जनमत संग्रह करवाएं। इधर छत्तीसगढ़ में शांति यात्रा पर आए स्वामी अग्निवेश ने जानकारी दी कि केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् नक्सलियों से बातचीत के लिए तैयार हैं बशर्ते नक्सली 72 घंटे के लिए शस्त्रविराम घोषित कर दें। श्री अग्निवेश के अनुसार उन्होंने दिल्ली में माओवादियों के समर्थकों से बात की और वे 72 घंटे तो क्या 72 दिन के शस्त्रविराम के लिए तैयार हैं। पेंच यह है कि इसकी पहल कौन करे। अग्निवेश जी का कहना है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी ओर से पहल कर दें।
जनमत संग्रह एक ऐसा राजनैतिक अस्त्र है जिसका भारत में अभी तक उपयोग नहीं किया गया है। इसमें बहुत सारी जटिलताएं हैं। जो छत्तीसगढ़ के संदर्भ में भी निरपवाद लागू होती हैं।
छत्तीसगढ़ की अवाम इस भीषण स्थिति की अनचाहे में ही पात्र बन गई है। एक तरफ नक्सली हैं, दूसरी तरफ पुलिस है, तीसरी ओर आदिवासी हैं। लेकिन बस्तर के दुर्गम अंचल में हो रहे रक्तपात के चलते प्रदेश का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं बचा है जहां दुश्चिंता की काली छाया न मंडरा रही हो। हर व्यक्ति जानना चाहता है कि आखिर इसका अंत कहां होगा। क्या बस्तर में फिर से शांति लौट पाएगी और कब?
यह चिंता ही है जो हमें बार-बार नक्सल समस्या पर सोचने के लिए मजबूर कर रही है। ऐसे समय वे प्रबुध्दजन ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं जो वैचारिक तथा राजनैतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर सोच सकते हों। समय की पुकार है कि प्रदेश के ये प्रबुध्दजन सामने आएं। ऐसा नहीं कि इस दिशा में कुछ न हो रहा हो। विगत गुरुवार को ''नवभारत'' में कनक तिवारी का एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कुछ प्रश्न उठाकर सोचने पर विवश किया है। इसी पत्र के संपादक श्याम वैताल व स्तंभ लेखिका सुभद्रा राठौर ने भी अपने विचार प्रकाशित किए हैं। बबन मिश्र जी के अखबार ''आज की जनधारा'' में दिवाकर मुक्तिबोध ने महाश्वेता देवी के योगदान को रेखांकित करते हुए उनसे सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की है। मतलब यह है कि सहमति-असहमति के बीच विचार मंथन तो चल रहा है। सोचना यह है कि समग्र और संपूर्ण रूप में इस प्रक्रिया को कैसे आगे बढ़ाया जाए।
मेरा अपना मानना है कि इसके लिए एक नहीं, बल्कि अनेक दिशाओं से पहल की जा सकती है। मैंने शनिवार 7 मई के अंक में जो प्रस्ताव दिया था उसे यहां दोहराना चाहूंगा। राजनारायण मिश्र, बसंत कुमार तिवारी, गुरुदेव कश्यप, शरद कोठारी, तरुण कांति बोस, धीरजलाल जैन, गोविन्दलाल वोरा, प्रभाकर चौबे, बबन प्रसाद मिश्र और रमेश नैय्यर ये सब वरिष्ठ पत्रकार हैं। इनमें से कुछेक तो राजनीति में सक्रिय हैं और कोई-कोई शासनतंत्र के भी हिस्से हैं। फिर भी अगर ये सब मिलकर बैठें तो कुछ ठोस सुझाव जरूर सामने आएंगे। ये सब साथ-साथ बस्तर के अध्ययन दौरे पर भी जाएं तो और भी अच्छा होगा।
एक दूसरा उपाय यह हो सकता है कि प्रदेश के समाद्दृत चिकित्सक और शिक्षक डॉ. महादेव प्रसाद पाण्डे की अगुवाई में प्रबुध्दजन मिलकर विचार मंथन के लिए बैठे। छत्तीसगढ़ बार एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन कौंसिल अथवा छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ् कॉमर्स जैसी संस्था भी इस दिशा में पहल कर सकती हैं। जो बस्तर नक्सली गतिविधियों का केन्द्र है, वहां की चेम्बर ऑफ कॉमर्स जैसा कोई संगठन भी अपनी ओर से इस दिशा में प्रयत्न कर सकता है। जगदलपुर में लाला जगदलपुरी, रऊफ परवेज, प्रतापनारायण अग्रवाल, बिमल अवस्थी जैसे विद्वत्जन हैं। वहां श्याम सोमानी और किशोर पारख जैसे युवा उद्यमी भी हैं। मेरा मकसद नाम गिनाना नहीं है, लेकिन इन जैसे लोग जमीनी हकीकत को शायद हमसे बेहतर जानते हैं। इनके पास समाधान के सूत्र भी हो सकते हैं।
ध्यान रखने की जरूरत है कि बस्तर की नक्सल समस्या चर्चा आज सिर्फ बस्तर या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सीमाओं को लांघकर इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं होने लगी हैं। न्यूयार्क टाइम्स, द गार्जियन तथा द इकानामिस्ट जैसे प्रतिष्ठित पत्रों में इस समस्या पर लिखा जा रहा है। उनकी कही-लिखी कौन सी बात हमें जमती है या नहीं जमती, यह अलग मुद्दा है। लेकिन यदि समस्या सुलझाना है तो एक तार्किक दृष्टिकोण विकसित करने व अपनाने की जरूरत होगी। बहरहाल, मैं अपने तमाम मित्रों से अपील करना चाहूंगा कि एक पूरी तरह से गैर राजनीतिक, गैर सरकारी और गैर प्रायोजित मंच पर आकर हमें रास्ता खोजने की शुरुआत अविलंब कर देना चाहिए।

ललित सुरजन
प्रदेश हित में साभार देशबंधु
ललित सुरजन जी का यह संपूर्ण आलेख दो किश्‍तों में देशबंधु के संपादकीय में पढा जा सकता है. 

बस्तर घोटुल के आदि देव लिंगो .... अब बस भी करो भगवन

पूरे एक हजार पचानबे दिन यानि तीन साल का लंबा इंतजार अपने परिजनों से मिलने का, ये इंतजार की घडिय़ां काटे नहीं कटती होंगी 'लिंगों’ से, वैसे भी सात भाईयों में सबसे छोटे सबके लाडले भावुक व संवेदनशील। कला व संस्कृति के इस देवता ने आदिवासी समाज को समाजिक सराकारों की अद्भुत समझ दी है।
कांकेर जिला मुख्यालय से दूर साल वन, एक छोटी सी बरसाती नदी और सालभर झर-झर झरने वाली झरिया के किनारे बसा सेमरगांव, इस कला व संस्कृति के देवता लिंगों का गांव है। पूरे तीन साल बीतने के बाद चौथे साल चैत्र माह में 'लिंगों’ के नेह भरे आमंत्रण पर पूरा परिवार या कह ले पूरा कुटुंब यहां इकट्ठा होता है। लिंगों के परिजन बस्तर के अलग-अलग गांवों में स्थापित (बसे) हैं, को कंधों पर पालकी में बिठाकर लाने का काम उनके द्वारा बनाए गए गोत्र के लोग करते हैं, यही एक माध्‍यम बन जाता है लोगों के आपस में मिलने का। इस पूरी सामाजिक संरचना को समझना भी एक अलग शोध का विषय हो सकता है। कहते हैं कि कला व संस्कृति के देवता लिंगों एक साथ अठारह वाद्ययंत्र बजा लेते थे और अद्भुत नृतक थे। इसकी बानगी चौंदहवीं के चांद की खूबसूरत चांदनी जो साल के ऊंचे भरे-पूरे दरख्तों से छन-छन कर आ रही थी देखने को मिली।
इस समागम (मेला) का हम भी तीन साल से इंतजार कर रहे थे। हम इससे पहले भी कई बार सेमरगांव गए हैं और लिंगों से भेंट की है। लिंगों गांव से थोड़ी दूर घने साल वन में निवास करते हैं आरै बहुचर्चित 'घोटुल’ आदिवासी समाज को इन्‍हीं की देन है, सामाजिक सरोकारों की यह अद्भुत पाठशाला हैं घोटुल। प्रसिद्घ समाजशास्त्री और नृशास्त्रीय वेरियर एलविन की चर्चित किताब 'मुरिया और उनका घोटुल’ में एलविन लिखते हैं- 'मुरिया घोटुल एक ऐसी संस्था है जिसकी शुरूआत लिंगोपेन-गोड़ों की लोक कथाओं के प्रसिद्घ नायक ने की थी और जिसकी सदस्य कबीले के हर अविवाहित लड़के तथा लड़की को बनना पड़ता है।
घोटुल की सदस्यता की, सावधानी द्वारा निर्धारित की गई, अपनी प्रक्रिया होती है। कुछ समय लड़कों और लड़कियों को निगरानी में रखने के बाद, उन्‍हें औपचारिक रूप से सदस्य बनाया जाता है। ऐसा करते समय उन्‍हें नए नाम दिए जाते हैं। प्रत्‍येक नाम के साथ एक श्रेणी और उसके अपने सामाजिक कर्तव्‍य जुड़े होते हैं। घोटुल के समाज को अनुशासित करने के लिए नेताओं को नियुक्‍त किया जाता है।
सारे सामाजिक अवसरों पर उन्‍हें महत्‍वपूर्ण दायित्‍वों का निर्वाह करना पड़ता है। इसकी झलक हमें मेले में देखने को मिली। रात में लिंगो के परिजनों जो अमूर्त रूप में होते हैं उन्‍हें कांधे पर उठाए समूह में लोग नाच रहे थे और उनके साथ आए लोग रंग-बिरंगे परिधानों में, पक्षियों, कौडिय़ों व मोती की मालाओं से सजे-धजे नाच रहे थे, इस नृत्‍य में सभी उम्र के लोग थे, कुछ समूह में नाच रहे थे तो कोई अकेला मस्ती में डूबा नाच रहा था और इन्‍हें देखने सैकड़ों लोगों की भीड़ थी जिन्‍हें हाथ में बांस की पतली-पतली टहनियां लिए युवा लड़के-लड़कियां नियंत्रित कर रहे थे और दर्शक भी पूरा सहयोग कर रहे थे। आठ-दस हजार की इस भीड़ में न तो छेड़छाड़ हुई, न मारपीट, न गाली-गलौज न धक्‍का-मुक्‍की सब अपने-अपने में मगन थे। मेले के चारों तरफ दुकानें सजी थीं। शाम को सिर्फ मेला स्थल पर ही लाइट थी बाकी चारों तरफ लोगों ने उजाले के लिए खुद ही व्यवस्था कर रखी थी। चारों तरफ घना साल का जंगल बस चौंदहवीं का चांद ही उजाला दे रहा था। सेमरगांव जहां लिंगों की पवित्र भूमि है वहीं ये संवेदनशील गांव के रूप में भी चिन्हित है।
सन् २००८ में इस गांव में नवनिर्मित स्कूल व उसके पास बने दो और भवनों को नक्‍सलियों ने ढहा दिया था चूंकि ये स्कूल गांव में प्रवेश करते समय सड़क के किनारे बनाया गया था इसलिए जब भी लिंगों के दर्शन करने जाते तो यह टूटा स्कूल आंखों को चुभता और मन को उदास कर जाता। हमारे साथ और लोगों को भी लग रहा था कि ये टूटा स्कूल उत्‍सव के समय अच्‍छा नहीं
लगेगा, क्‍या किया जाए? और उसका भी समाधान हो गया। उस टूटे स्कूल का मलबा उठा लिया गया और उस पूरी जगह को समतल कर दिया गया। एक और बात अच्‍छी हुई कि पुलिस व फोर्स को तैनात नहीं किया गया, इतनी बड़ी भीड़ स्वयं नियंत्रित थी।
बस्तर में मेला-मड़ई परिजनों से मेल-मुलाकात व एक-दूसरे के घर अतिथि बनकर जाने का होता है, जानकारियां इकट्ठी करने का भी सबसे अच्‍छा माध्‍यम, इसी प्रक्रिया के दौरान पता चला की इस बार मेला दूसरे दिन दोपहर तक समाप्‍त हो जाएगा यानि हमारी करनियों का फल अब हमारे देवी- देवताओं को भी भुगतना पड़ेगा। तीन साल के लंबे इंतजार के बाद लिंगों अपने परिजनों के साथ खूब उत्‍सव मनाते हैं और अंतिम दिन वो अपने स्थान में झूले पर बिराजते हैं और उनके आवास के सामने जो आंगन हैं उसमें उनके नाते-रिश्तेदार मांदर, मांदरी, ढोलकी, घुघरू और ऐसे ही अनेक वाद्ययंत्रों के समुमधुर संगीत स्‍त्री-पुरूषों के सुरीले सामूहिक गान का मजा लेते हुए, मंद-मंद पवन के झोकों के साथ झूला झूलते हुए अपने परिजनों को बिदा करते हैं, परंतु इस बार ये बिदाई ऐसी भागदौड़ में हुई कि कुछ समझ में नहीं आया। इस भागदौड़ से मन एकदम तिक्‍त हो गया क्‍योंकि अभी तक तो मुझे ऐसा एकांत मिल ही नहीं पाया था जब मैं मन को एकाग्र कर लिंगों से कह सकूं कि बस्तर में फिर से सुख-शांति और जीवन का संगीत लौट आए और कह संकू कि अब बस भी करो भगवन्।
तनाव-दबाव और फरमानों के बीच कैसे जिया जाता है यह तो वह समझ सकता है जिसे जीना पड़ता है, यही वो बिंदू है जहां शब्‍द मौन हो जाते हैं। इस तरह दबावों के साथ लोग जीना तो सीख गए हैं परंतु कभी-कभी अखरता भी है, सीधी बात है इसे समझाया नहीं जा सकता खासतौर से जब हमारी संवेदनाएं भोथरी हो चुकी है इसे न तो शासन-प्रशासन समझ पाता है और न वो मानव अधिकारों की वकालत करने वाले इसमें से अधिकांश ने सिर्फ नक्‍शे में ही बस्तर देखा है या फिर जिला मुख्यालयों को छू कर बयान दिया और लौट गए। शहरों में पर्व-उत्‍सवों का मतलब है सत्‍ता, शक्ति और पैसों का भोंडा प्रदर्शन। वो क्‍या समझें कमसिन उम्र से उम्रदराज लोगों का मस्ती में डूबकर अपने पुरखों के सामने नाचना जिन्‍हें वो प्‍यार से बूढ़ादेव - बूढ़ीदाई कहते हैं परंतु तथा कथित सभ्य समाज के लिए पिछड़े और असभ्य लोग हैं, जो आज भी आदिम युग में रहना चाहते हैं। परंतु क्‍या इन सभ्य लोगों को अहसास है कि इन्‍हीं लोगों ने हजारों हेक्‍टेयर में जंगल को बचा रखा है जो जिंदा रहने के लिए प्राणवायु देते हैं जो आज भी आषाढ़ के बादलों को रिझाते हैं जिससे इस पृथ्‍वी पर पानी बचा है। क्‍या हम बिना हवा-पानी के भी जी सकते हैं यदि कोई तरीका हो तो हमें बताना क्‍योंकि यही संसाधन हमारे जी का जंजाल बन गए हैं?
आशा शुक्ला
(लेखिका लंबे समय से छत्तीसगढ़ में पत्रकार के रुप में काम कर चुकी हैं। इन दिनों कांकेर में रहकर वे सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रही हैं)
प्रदेश हित में साभार छत्तीसगढ़
घोटुल, लिंगो देव व मुरिया के चित्रों को आप फ्लिकर में यहां देख सकते हैं -

खास उमर और उंचाई के पहुच पर आम : दो चित्र

मेरे घर के 'कोलाबारी' मे आम के दो अलग अलग प्रजाति के पेड लगे हैं. बड़ा पेड़ लगभग बारह फिट उंचा है और छोटा लगभग पांच फुट. दोनों नें इस वर्ष कोयलों के कूक को नियमित रखते हुए हमारी सेवा का फल गिनती में ही सहीं पर दिया है. देखें दोनों भाइयों को आपने अपने पेड़ पर फले आमों से आत्मीयता बनाते हुए -


देशी आम के पकने के इंतजार में पेड पर पाईपों के सहारे अपना मचान में खड़ा अनिमेश


दशहरी आमो पर अपना हक जताता क्षितिज 

* 'कोलाबारी' : घर से लगे बगिया को छत्तीसगढ़ी में कोलाबारी कहा जाता है. 

संगी-साथी

ब्‍लॉगर संगी