छत्तीसगढ़ के बुध्दिजीवियों को आह्वान

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने दो दिन पूर्व दिल्ली के एक कार्यक्रम में कहा कि नक्सल समस्या पर चुनाव आयोग या किसी निष्पक्ष संस्था से पूरे राज्य में जनमत संग्रह करवा लिया जाए। कल उन्होंने फिर कहा कि शांतिवार्ता की बात जो बुध्दिजीवी कर रहे हैं वे ही जनमत संग्रह करवाएं। इधर छत्तीसगढ़ में शांति यात्रा पर आए स्वामी अग्निवेश ने जानकारी दी कि केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् नक्सलियों से बातचीत के लिए तैयार हैं बशर्ते नक्सली 72 घंटे के लिए शस्त्रविराम घोषित कर दें। श्री अग्निवेश के अनुसार उन्होंने दिल्ली में माओवादियों के समर्थकों से बात की और वे 72 घंटे तो क्या 72 दिन के शस्त्रविराम के लिए तैयार हैं। पेंच यह है कि इसकी पहल कौन करे। अग्निवेश जी का कहना है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी ओर से पहल कर दें।
जनमत संग्रह एक ऐसा राजनैतिक अस्त्र है जिसका भारत में अभी तक उपयोग नहीं किया गया है। इसमें बहुत सारी जटिलताएं हैं। जो छत्तीसगढ़ के संदर्भ में भी निरपवाद लागू होती हैं।
छत्तीसगढ़ की अवाम इस भीषण स्थिति की अनचाहे में ही पात्र बन गई है। एक तरफ नक्सली हैं, दूसरी तरफ पुलिस है, तीसरी ओर आदिवासी हैं। लेकिन बस्तर के दुर्गम अंचल में हो रहे रक्तपात के चलते प्रदेश का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं बचा है जहां दुश्चिंता की काली छाया न मंडरा रही हो। हर व्यक्ति जानना चाहता है कि आखिर इसका अंत कहां होगा। क्या बस्तर में फिर से शांति लौट पाएगी और कब?
यह चिंता ही है जो हमें बार-बार नक्सल समस्या पर सोचने के लिए मजबूर कर रही है। ऐसे समय वे प्रबुध्दजन ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं जो वैचारिक तथा राजनैतिक संकीर्णता से ऊपर उठकर सोच सकते हों। समय की पुकार है कि प्रदेश के ये प्रबुध्दजन सामने आएं। ऐसा नहीं कि इस दिशा में कुछ न हो रहा हो। विगत गुरुवार को ''नवभारत'' में कनक तिवारी का एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कुछ प्रश्न उठाकर सोचने पर विवश किया है। इसी पत्र के संपादक श्याम वैताल व स्तंभ लेखिका सुभद्रा राठौर ने भी अपने विचार प्रकाशित किए हैं। बबन मिश्र जी के अखबार ''आज की जनधारा'' में दिवाकर मुक्तिबोध ने महाश्वेता देवी के योगदान को रेखांकित करते हुए उनसे सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की है। मतलब यह है कि सहमति-असहमति के बीच विचार मंथन तो चल रहा है। सोचना यह है कि समग्र और संपूर्ण रूप में इस प्रक्रिया को कैसे आगे बढ़ाया जाए।
मेरा अपना मानना है कि इसके लिए एक नहीं, बल्कि अनेक दिशाओं से पहल की जा सकती है। मैंने शनिवार 7 मई के अंक में जो प्रस्ताव दिया था उसे यहां दोहराना चाहूंगा। राजनारायण मिश्र, बसंत कुमार तिवारी, गुरुदेव कश्यप, शरद कोठारी, तरुण कांति बोस, धीरजलाल जैन, गोविन्दलाल वोरा, प्रभाकर चौबे, बबन प्रसाद मिश्र और रमेश नैय्यर ये सब वरिष्ठ पत्रकार हैं। इनमें से कुछेक तो राजनीति में सक्रिय हैं और कोई-कोई शासनतंत्र के भी हिस्से हैं। फिर भी अगर ये सब मिलकर बैठें तो कुछ ठोस सुझाव जरूर सामने आएंगे। ये सब साथ-साथ बस्तर के अध्ययन दौरे पर भी जाएं तो और भी अच्छा होगा।
एक दूसरा उपाय यह हो सकता है कि प्रदेश के समाद्दृत चिकित्सक और शिक्षक डॉ. महादेव प्रसाद पाण्डे की अगुवाई में प्रबुध्दजन मिलकर विचार मंथन के लिए बैठे। छत्तीसगढ़ बार एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन कौंसिल अथवा छत्तीसगढ़ चेंबर ऑफ् कॉमर्स जैसी संस्था भी इस दिशा में पहल कर सकती हैं। जो बस्तर नक्सली गतिविधियों का केन्द्र है, वहां की चेम्बर ऑफ कॉमर्स जैसा कोई संगठन भी अपनी ओर से इस दिशा में प्रयत्न कर सकता है। जगदलपुर में लाला जगदलपुरी, रऊफ परवेज, प्रतापनारायण अग्रवाल, बिमल अवस्थी जैसे विद्वत्जन हैं। वहां श्याम सोमानी और किशोर पारख जैसे युवा उद्यमी भी हैं। मेरा मकसद नाम गिनाना नहीं है, लेकिन इन जैसे लोग जमीनी हकीकत को शायद हमसे बेहतर जानते हैं। इनके पास समाधान के सूत्र भी हो सकते हैं।
ध्यान रखने की जरूरत है कि बस्तर की नक्सल समस्या चर्चा आज सिर्फ बस्तर या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सीमाओं को लांघकर इस बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं होने लगी हैं। न्यूयार्क टाइम्स, द गार्जियन तथा द इकानामिस्ट जैसे प्रतिष्ठित पत्रों में इस समस्या पर लिखा जा रहा है। उनकी कही-लिखी कौन सी बात हमें जमती है या नहीं जमती, यह अलग मुद्दा है। लेकिन यदि समस्या सुलझाना है तो एक तार्किक दृष्टिकोण विकसित करने व अपनाने की जरूरत होगी। बहरहाल, मैं अपने तमाम मित्रों से अपील करना चाहूंगा कि एक पूरी तरह से गैर राजनीतिक, गैर सरकारी और गैर प्रायोजित मंच पर आकर हमें रास्ता खोजने की शुरुआत अविलंब कर देना चाहिए।

ललित सुरजन
प्रदेश हित में साभार देशबंधु
ललित सुरजन जी का यह संपूर्ण आलेख दो किश्‍तों में देशबंधु के संपादकीय में पढा जा सकता है. 
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1 टिप्पणियाँ:

  1. बने कहात हे।
    कुछु त करय,गाल बजाए ले काहीं नई होय।

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