प्रिंट मीडिया में टिप्‍पणी चर्चा

प्रिंट मीडिया पर आजकल ब्‍लॉग पोस्‍टों की चर्चा एवं पोस्‍टों का प्रकाशन लगभग हर समाचार पत्र में हो रहा है, किन्‍तु छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित सांध्‍य दैनिक छत्‍तीसगढ़ के संपादकीय पन्‍ने पर चौपाल स्‍तंभ के तहत् मेरे ब्‍लॉगों में छत्‍तीसगढ़ के पन्‍नों के लेखों को इस ब्‍लॉग में पुन:प्रकाशन पर आये कुछ टिप्‍पणियों को प्रकाशित किया जा रहा है, मेरे पिछले पोस्‍ट 'भारत के औद्योगिक इतिहास में पहली बार केन्‍द्र सरकार ने की ऐसी साहसी कार्रवाई' में आये आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी एवं अली भाई की टिप्‍पणी को पिछले दिनों छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र नें अपने संपादकीय पन्‍ने पर चौपाल स्‍तंभ के तहत् प्रकाशित किया है. प्रस्‍तुत है समाचार पत्र की कतरन (चित्र को क्लिक कर इमेज बड़ा कर पढें)-


संजीव तिवारी

दंतेवाड़ा के बच्‍चे पुलिस नहीं बनना चाहते


बस्‍तर सत्‍याग्रह में निकले पूर्व मुख्‍यमंत्री अजित जोगी जी के पुत्र अमित जोगी जी नें कल नवीन संयुक्‍त आश्रम मैलवाड़ा के स्‍कूली बच्‍चों को पढ़ाते हुए जब पूछा कि कितने बच्‍चे पुलिस बनना चाहते हैं तो सभी बच्‍चों नें कहा वे पुलिस नहीं बनना चाहते ............... ?????


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आरंभ

भारत के औद्योगिक इतिहास में पहली बार केन्‍द्र सरकार ने की ऐसी साहसी कार्रवाई

कल के दैनिक छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍य पृष्‍ट पर धान के कटोरा एवं वनो की धरती कहे जाने वाले छत्‍तीसगढ़ के भूमि पर वृहद उद्योगों का अंबार खड़ी करने वाले एवं समाचार पत्रों में भारी भरकम विज्ञापन देने वाले जिन्‍दल समूह से संबंधित एक समाचार नें बरबस मेरा ध्‍यान आकर्षित किया। छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र सांध्‍य दैनिक है इस कारण इसके मुख्‍य समाचार दूसरे दिन के अखबारों में भी पढ़ने को मिलते हैं इस कारण भरोसा था कि आज के अखबारों में इस संबंध में प्रकाशित समाचारों को पढ़कर अपनी व्‍यक्तिगत सोंच इस समाचार के संबंध में जाहिर कर पाउंगा किन्‍तु आज इस समाचार के छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र में प्रकाशन के दूसरे दिन किसी भी समाचार पत्र  में यह समाचार प्रकाशित नहीं हुआ। तो हमने सोंचा इस समाचार को ब्‍लॉग पर प्रस्‍तुत किया जाए। छत्‍तीसगढ़ में प्रकाशित संपूर्ण समाचार यहां देखें,  समाचार का टैक्‍स्‍ट इस प्रकार है -  
  
जिंदल बिजलीघर केन्‍द्र सरकार ने रोका, बिना इजाजत, बिना जमीन निर्माण पर राज्‍य को कार्रवाई के लिए कहा

रायपुर, 19 जून (छत्‍तीसगढ़)। प्रदेश के सबसे बड़े निजी उद्योगपति और कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल की कंपनी को केन्‍द्र सरकार की ओर से तगड़ा झटका लगा जब कल भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने रायगढ़ के तमनार में जिंदल के बिजलीघर की योजना को खारिज कर दिया और छत्‍तीसगढ़ सरकार से कहा है कि वह पर्यावरण के नियम तोडऩे के लिए जिंदल के खिलाफ केस दर्ज किया जाए। रायगढ़ के जन चेतना नाम के सामाजिक संगठन की शिकायत पर केन्‍द्र सरकार ने एक टीम बनाकर तमनार में जांच करवाई थी और उसकी रिपोर्ट के आधार पर यह कार्रवाई की गई है। जन चेतना संगठन के रमेश अग्रवाल लगातार रायगढ़ में उद्योगों की मनमानी के खिलाफ लगे हुए हैं और उन्‍होंने 'छत्‍तीसगढ़' को भारत सरकार के कल के आदेशों की प्रतियां भेजते हुए इस बात पर खुशी जाहिर की कि भारत के औद्योगिक इतिहास में पहली बार केन्‍द्र सरकार ने ऐसी साहसी कार्रवाई की है और इससे तमनार के आदिवासियों को इंसाफ मिलसकेगा।

उल्लेखनीय है कि बिजलीघर बनाने के मामले में जिंदल ने बिना पर्यावरण मंजूरी के और बिना पर्याप्‍त जमीन के गैरकानूनी निर्माण शुरू कर दिया था। इस बारे में 'छत्‍तीसगढ़' ने पिछले महीनों में लगातार रिपोर्ट छापी थीं और इन रिपोर्टों को लेकर जिंदल ने 'छत्‍तीसगढ़' के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू की थी। कल के इन आदेशों से इस ताकतवर उद्योग समूह की मनमानी स्थापित हो गई है क्‍योंकि नवीन जिंदल उसी कांग्रेस पार्टी के ताकतवर सांसद हैं जो केन्‍द्र सरकार में मुखिया है और खासकर केन्‍द्रीय पर्यावरण मंत्री कांग्रेस पार्टी के ही हैं।

24 सौ मेगावाट की बिजली योजना जिंदल की 18 जून 10 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने जिंदल पॉवर लिमि. के डायरेक्‍टर को सूचित किया है कि उनके द्वारा 24 सौ मेगावाट का प्रस्तावित कोयला आधारित ताप बिजली घर का प्रस्ताव मंत्रालय ने अस्वीकार कर दिया है। केंद्र सरकार ने एक दूसरे पत्र में प्रदेश के आवास एवं पर्यावरण सचिव को लिखा है कि जिंदल द्वारा पर्यावरण स्वीकृति प्राप्‍त किए बिना पॉवर प्‍लांट का काम शुरू करना वन संरक्षण अधिनियम के नियमों के खिलाफ है। अधिनियम की धारा 19 के तहत जिंदल के खिलाफ केस दर्ज किया जाए।

इस पूरे मामले में जिंदल स्टील एवं पॉवर लिमिटेड के उपाध्‍यक्ष प्रदीप टंडन ने 'छत्‍तीसगढ़' से चर्चा में कहा कि उन्‍हें अभी तक इसतरह की कोई कार्रवाई संबंन्‍धी पत्र के बारे में कोई जानकारी नहीं है। 31 मार्च 2009 को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने जिंदल के इस बिजली घर के लिए सैद्धांतिक स्वीकृति देते हुए, जिंदल के आवेदन पर विचार करते हुए टीओआर निर्धारित किए थे। जिनके मुताबिक जिंदल को अपनी पर्यावरण अध्‍ययन रिपोर्ट तैयार कर प्रथम जनसुनवाई करवानी थी।

इसी बीच बिना स्वीकृति प्राप्‍त हुए जिंदल द्वारा बिजली घर के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया गया। 'छत्‍तीसगढ़' नें इस आशय कीखबर प्रमुखता से प्रकाशित की थी। पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था जनचेतना ने भी जिंदल घराने के गैरकानूनी कार्यों की शिकायत केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से की थी। शिकायत पर कार्रवाई कर केंद्रीय मंत्रालय ने एक दो सदस्यीय जांच चल रायगढ़ भेजा, जिन्‍होंने 22 मई 2010 को तमनार परियोजना स्थल का निरीक्षण किया और पाया कि जिंदल ने प्रस्तावित 24 सौ मेगावॉट के पॉवर प्‍लांट के लिए 62 हेक्‍टेयर पर काम शुरू भी कर दिया था। इसके पहले जिंदल को एक हजार मेगावाट के प्‍लांट के लिए मंत्रालय ने स्वीकृति 8 जून 2006को दी थी। मंत्रालय ने लिखा है कि 31 मार्च 2009 को जारी किए गए पत्र में 24 सौ मेगावाट के लिए 1041 हेक्‍टेयर भूमि की आवश्यकता बताई गई थी, जिसमें से 491 हेक्‍टेयर राखड़ बांध के लिए, 2 हेक्‍टेयर जलाशय और 100 हेक्‍टेयर कॉलोनी के लिए बताई गई थी। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने नोट किया कि 62 हेक्‍टेयर भूमि में इतना बड़ा प्‍लांट लगाया जाना संभव नहीं है। इस बात को भी गंभीरता से लिया कि जिंदल द्वारा 24 सौ मेगावाट के पॉवर प्‍लांट का स्थान बदली किए जाने की जानकारी भी मंत्रालय को नहीं दी गई। इसमें पर्यावरण मंत्रालय ने आपत्ति दर्ज की है।

मंत्रालय ने पाया कि 24 सौ मेगावॉट प्‍लांट की योजना प्री-मेच्‍योर है। ऐसा कोई स्थान नहीं है, जहां इतना बड़ा प्‍लांट लगाया जा सके। इन तथ्‍यों के प्रकाश में मंत्रालय ने 31 मार्च 2009 को 24 सौ मेगावॉट के लिए जारी किए गए दिशा निर्देशों को वापस लेते हुए जिंदल को पुन: नया आवेदन जमा करने के लिए कहा है। इस तरीके से प्रस्ताव को रद्द किए जाने से 8 मई 2010 को हुई जन सुनवाई स्वमेव निरस्त हो जाती है। उसका कोई औचित्‍य नहीं रह जाता।


राज्‍य ने निर्माण पहले ही रोक दिया था- बैजेन्‍द्र
छत्‍तीसगढ़ शासन के पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव बैजेन्‍द्र कुमार ने इस बारे में कहा कि 18 जून के भारत सरकार के ये पत्र राज्‍य शासन को अब तक नहीं मिले हैं इसलिए वे इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकते, लेकिन राज्‍य शासन ने पहले ही जिंदल के इस बिजलीघर का निर्माण कार्य रोक दिया था क्‍योंकि वह पर्यावरण की मंजूरी के बिना बनाया जा रहा था। उन्‍होंने कहा कि इसके लिए हुई जनसुनवाई में बड़ी संख्या में आपत्तियां आई थीं। उन्‍हें दो बैग में भरकर केन्‍द्र सरकार को भेज दिया गया है। अभी वे आपत्तियां वहां पहुंची नहीं होंगी। उन्‍होंने कहा कि केन्‍द्र सरकार ने जिंदल के निर्माणाधीन बिजलीघर की जांच करने के लिए एक टीम भेजी थी जिसके साथ राज्‍य शासन के अधिकारी भी गए थे। उसकी रिपोर्ट केन्‍द्र से अभी मिली नहीं है। बैजेन्‍द्र कुमार ने कहा कि पर्यावरण नियम तोडऩे वाले बहुत से और उद्योगों, खदानों के खिलाफ भी राज्‍य शासन ने कार्रवाई की है।

विकास के राह में धोबी : तीन चित्र

आपने अपने बचपन में धोबी और उसके गधे के संबंध में मजेदार कहानियॉं सुनी होगी, कहानियॉं याद हो कि न हो पर गधे और धोबी का संबंध तो याद ही होगा. हो सकता है कुछ लोगों नें धोबी को गधे के पीठ पर कपड़ा लादे लाते ले जाते प्रत्‍यक्ष देखा भी होगा. जमाना बदल गया है धोबी ड्राईक्‍लीनर्स और उनका दुकान अब लांड्री हो गया है. बदलते जमाने के साथ ही गधा भी धोबियों की पकड़ से दूर हो गया है. विकास के राह में धोबी और गधे के चित्र देखें-


धोबी जी का गधा है हमारा बजाज


श्रीमान ड्राई क्‍लीनर्स महोदय

अब इंतजार ही शेष है

हथियार माओवादियों को चला रहा है - अभिजीत मजूमदार

नक्सल आंदोलन के संस्थापक चारू मजूमदार के बेटे और सीपीआईएमएल लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी के सदस्य अभिजीत मजूमदार का मानना है कि भारत में चल रहा माओवादी आंदोलन बहुत छोटी लड़ाई तक सिमट कर रह गया है. उनकी राय में हथियार के पीछे एक राजनीति होनी चाहिए और वे महसूस करते हैं कि अब हथियार माओवादियों को चला रहा है. चुनाव के रास्ते संसदीय राजनीति में आने वाली सीपीआईएमएल लिबरेशन के नेता अभिजीत मजूमदार मानते हैं कि माओवादियों को भी दूसरे जन आंदोलन में आना चाहिये. पिछले दिनों उनके सिलीगुड़ी स्थित पार्टी कार्यालय में आलोक प्रकाश पुतुल नें लंबी बातचीत की जिसे रविवार डाट काम में पढ़ा जा सकता है.

प्रिंट मीडिया में टिप्‍पणी चर्चा

प्रिंट मीडिया पर आजकल ब्‍लॉग पोस्‍टों की चर्चा एवं पोस्‍टों का प्रकाशन लगभग हर समाचार पत्र में हो रहा है, किन्‍तु छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित सांध्‍य दैनिक छत्‍तीसगढ़ के संपादकीय पन्‍ने पर चौपाल स्‍तंभ के तहत् मेरे ब्‍लॉगों में छत्‍तीसगढ़ के संपादकीय पन्‍नों के लेखों के ब्‍लॉग में पुन:प्रकाशन पर आये सार्थक टिप्‍पणियों को प्रकाशित किया जा रहा है,  मेरे पिछले पोस्‍ट 'अरुंधति से सहमत असहमत : कनक तिवारी' में आये विरोध (आदरणीय अम्‍बरीश जी) एवं आदरणीय अली भाई के टिप्‍पणी को आज छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र नें अपने संपादकीय पन्‍ने पर प्रकाशित किया है. प्रस्‍तुत है समाचार पत्र की कतरन (चित्र को क्लिक कर इमेज बड़ा कर पढें)- 







संजीव तिवारी

अरुंधति से सहमत असहमत : कनक तिवारी

बूकर पुरस्कार विजेता सुप्रसिद्ध लेखिका अरुंधति राय अपने एक विवादास्पद भाषण की गलत रिपोर्टिंग के कारण फिर सुर्खियों में हैं। नक्सलवाद को लेकर उनकी जानकारियां, सूचनाएं और घुमक्कड़ी सर्वज्ञात हैं। वे लगातार आदिवासियों के सुख-दुख से जुड़कर संघर्ष करती रहती हैं। शंकर गुहा नियोगी जैसे लोकप्रिय श्रमिक नेता की याद में अरुंधति छत्तीसगढ़ भी आती रही हैं। उन्होंनें एक मामले में अदालत की अवमानना का खतरा उठाकर सुप्रीम कोर्ट से दो टूक लिखा पढ़ी भी की थी और उन्हें जेल तक की सजा हुई थी। मैंने खुद इस सम्बन्ध में एक लेख उनके समर्थन में लिखा था। उस सिलसिले में अरुंधति का पक्ष भारतीय न्यायपालिका के पारंपरिक रूढ़ सिद्धांतों को इस कदर चुनौती देता हुआ था कि उनकी सजा को लेकर विश्व के शीर्ष चिंतकों और नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने भी अदालत से अरुंधति के पक्ष में अपील की थी। इन विख्यात विचारकों में नॉम चॉम्स्की भी शामिल थे।

बस्तर में नक्सलवाद को लेकर लिखी अपनी किताब 'लाल क्रांति बनाम ग्रीन हंट’ के अंतिम कवर पेज पर मैंने अनुमति लेकर अरुंधति राय का वाक्यांश भी छापा है जो उनके उस लेख का हिस्सा है जो मेरी किताब के परिशिष्ट में शामिल है। 'अगर आदिवासियों ने आज हथियार उठा लिये हैं तो इसलिए, क्योंकि एक ऐसी सरकार, जिसने इन्हें हिंसा और उपेक्षा के अलावा और कुछ नहीं दिया, अब इनकी आखिरी अमानत को छीन लेना चाहती है-इनकी जमीन। जाहिर है, जब सरकार कहती है कि वह उनके क्षेत्र का विकास करना चाह रही है, तो वे इस बात पर विश्वास नहीं करते। वे नहीं मानते कि दंतेवाड़ा में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम द्वारा बनवाई जा रही एक हवाई पट्टी जितनी चौड़ी है, सड़क उनके बच्‍चों के स्कूल जाने के लिए है। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंनें अपनी जमीन की लड़ाई नहीं लड़ी, तो वे ध्‍वस्त हो जाएंगे और इसीलिए उन्होंनें हथियार उठा लिये हैं। आज भले ही ऑपरेशन ग्रीनहंट पर सबकी निगाह है, लेकिन भारत के अन्‍य हिस्सों में-जो कि इस युद्ध क्षेत्र से बाहर हैं-गरीबों, मजदूरों, भूमिहीनों और जिनकी जमीनें सरकार 'सार्वजनिक उद्देश्य' के नाम पर हड़पना चाह रही है, उनके अधिकारों पर हमला और तेज होगा। उनका दर्द और गहराता जाएगा और इसकी कोई सुनवाई भी नहीं होगी।'

मैंने अरुंधति के साथ मंच पर भाषण दिया है और कारपोरेट घरानों द्वारा आदिवासियों की जमीनों पर कब्‍जा करने के कुचक्रों का विरोध भी किया है। नक्संलवाद की समस्या को लेकर संभवत: 'जनसत्‍ता' में सर्वाधिक लेख छपे होंगे। यह सब लिखना इसलिए जरूरी है कि मुझ जैसे व्यक्ति को अरुंधति राय के बयानों के कुछ हिस्सों से असहमति भी हुई है। जंगलों और आदिवासियों की जमीनों पर कब्‍जा करके दैत्‍याकार कारखाने लगाने की सरकार की नीति अलबत्ता एक बड़े बौद्धिक विरोध को आमंत्रण देती है। मैंने खुद टाटा और एस्सार स्टील के विरुद्ध एक नागरिक और वकील सुधा भारद्वाज की ओर से जनहित याचिका दायर की है। यह इस देश की न्यायपालिका है जिसने मामले की सुनवाई उस दिन संपन्न की, जब हाईकोर्ट के सभी वकील केवल एक दिन के लिए शत- प्रतिशत हड़ताल पर थे। दूसरे दिन विरोध करने पर न्‍यायालय ने सुनवाई नहीं खोलते हुए एक सप्ताह का समय केवल लिखित तर्क प्रस्तुत करने के लिए सभी पक्षों को दिया। समयावधि में पावती सहित लिखित तर्क पेश होने के बावजूद यह उल्‍लेख किया गया कि याचिकाकर्ताओं की ओर से लिखित तर्क नहीं मिला है। निर्णय को इस आधार पर फिर चुनौती दी गई कि लिखित तर्क प्रस्तुत कर दिया गया था और उस पर न्‍यायालय ने विचार तक नहीं किया है। आज तक वह पुनरीक्षण मामला लंबित है।

झूठे पुलिसिया एनकाउंटर का आरोप लगाकर मृतक आदिवासी परिवारों की ओर से याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर की गई हैं। वे आज तक लंबित हैं। बहुत से और प्रकरण भी इसी तरह लंबित हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इस देश की न्यायपालिका पर लगाए जाने वाले आरोप पूरी तौर पर गलत नहीं हैं। इसके बावजूद यदि हिंसक लड़ाई लंबी किए जाने के दावे किए जा रहे हैं, तो अहिंसक और कानूनी लड़ाई लडऩे के लिए हममें धीरज क्‍यों नहीं है?

कौन कहता है कि सरकारें दूध की धुली हुई हैं। पुलिस बेहद भ्रष्ट, निकम्मी और कायर भी है। मीडिया की जितनी स्तुति की जाए कम है। लेकिन यह सब लचर मनोवैज्ञानिकता तो लोकतंत्र का जरूरी उत्‍पाद है। क्‍या अरुंधति ऐसा समझती हैं कि माओवादियों के पास कोई जादुई छड़ी है जिससे इस देश में रामराज्‍य, नहीं, नहीं माओ राज्‍य आ जाएगा?

जहां तक लालगढ़, छत्तीसगढ़, ओडि़सा, आंध्र, बिहार, झारखंड या बंगाल वगैरह में माओवाद का चिंताजनक फैलाव है-उसकी दार्शनिक जांच के पैमाने अरुंधति के पास हैं। वे अलबत्ता ठीक- ठाक लगते हैं। भारतीय संविधान सभा ने तीन वर्षों की बैठक के बाद जनता का आईन गढ़ा। उसे बहुत से वायवी सैद्धांतिक मामलों तक पर बहस करने का पर्याप्त समय और उत्‍साह मिला। मूल अधिकारों और हाईकोर्ट में दाखिल होने वाली याचिकाओं के मॉडल तो उन्हें अमेरिका और इंगलैंड से ऐसे ही मिल गए थे। लेकिन अपने देश की लगभग बीस प्रतिशत दलित-आदिवासी जनता की सदियों पुरानी जीवन सड़ांध को खुशबू में बदलने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने उस धैर्य और श्रम का प्रदर्शन नहीं किया, जिस अभाव को इतिहास की चूक के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।

गांधी जैसे शिखर-पुरुष ने खुद को संविधान सभा से अलग रखा। संविधान सभा ने भी गांधी- विचारों को तरजीह नहीं दी। गांधी को ही अपने जीवन में यह मलाल था कि उन्हें आदिवासियों की समस्याओं के लिए जितना ध्‍यान देना था, उसके लिए वक्त ही नहीं मिल पाया। यह संविधान का अजूबा है कि आदिवासियों की समस्याओं और अधिकारों को उनके परंपरागत प्राकृतिक अधिकारों के संदर्भ में रेखांकित नहीं किया गया। यह सुरक्षा जरूर ढूंढ़ ली गई कि राज्‍यपालों को यह अधिकार होगा कि वे मंत्रिपरिषदों से सलाह किए बिना यह तय करें कि संसद और विधानसभाओं में रचे गए अधिनियम और कानून आवश्यकतानुसार अनुसूचित आदिवासी क्षेत्रों में लागू ही नहीं किए जाएं। राज्‍यपालों को ये अधिकार भी दिए गए कि वे ऐसे इलाकों के लिए विधायिका की मदद के बिना कानून गढ़ सकते हैं। अरुंधति को इस संवैधानिक चूक, विशेषताया राज्‍यपालों की उदासीनता को लेकर अपना तर्क महल खड़ा करना चाहिए था।

प्रधानमंत्री ने कभी नहीं कहा कि आदिवासी इलाकों में नक्‍सली घुसे हैं। इसलिए उन्हें आदिवासियों से अलग करने के लिए सरकार ऐसी योजनाओं का क्रियान्‍वयन करेगी जिससे आदिवासी समृद्ध हों और नक्‍सलियों का दामन छोड़ दें। किस्सा कोताह यह हुआ कि वनवासियों को यदि उनके परिवेश से खदेड़ दिया जाए। जिस तरह वनैले पशुओं को घेरकर शहर की ओर भगाया जाता है, तो अकेले नक्‍सली वनों में क्‍या करेंगे। इस तरह न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। अरुंधति का यह भी आरोप है कि सरकार की इस नीयत के कारण माओवादियों को वह अनावश्यक भूमिका, प्रचार और महत्‍व मिला जिसके वे अन्‍यथा हकदार नहीं थे। अरुंधति का यह भी आरोप है कि कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं और झारखंड के मधु कोड़ा जैसे राजनीतिज्ञों के पास अकूत धन होने के आरोप मीडिया के बाजार में उछलते रहते हैं। इस बात पर ज्‍यादा बौद्धिक हो-हल्‍ला क्‍यों नहीं मचता कि उद्योग जगत के वे कौन से तत्‍व हैं जो असली खलनायकों की शक्‍ल अख्तियार किए हुए राजनीतिज्ञों को कठपुतलियों की तरह नचाते रहते हैं। क्‍या वजह है कि देश में एक राजा जैसे व्यक्ति को मंत्री बनाए जाने और फिर खास महकमा दिलाए जाने के लिए प्रभावशाली परोकार उद्योगपति टाटा की दलाली के आरोपी बताए जाते हैं। टाटा के ही कारण नंदीग्राम और सिंगूर में एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल हुई। यदि ममता बनर्जी नहीं होतीं तो नैनो कारखाना तो लग ही गया होता। यही टाटा उद्योग है जो एस्सार वगैरह के साथ बस्तर में आए बिना मानेगा नहीं।

यहां ठहरकर लेकिन नक्‍सलियों की औद्योगिक समझ की नीयत पर सवाल खड़े होते हैं। यह तो अरुंधति ने भी माना है कि बाक्‍साइट या लौह अयस्क जैसे खनिजों के उत्‍खनन को लेकर माओवादी भी आदिवासियों की चिंताओं से बेपरवाह हैं। सरकार चाहती है कि सारे खनिज निजी उद्योगपति खोद लें और जंगल में मंगल मनाएं। आदिवासी चाहें तो मंगल गृह में जाकर अपना जंगल ढूंढ़ें। माओवादी चाहते हैं कि खदानें खनिज उत्‍पादन तो करें लेकिन वह सब सार्वजनिक क्षेत्र में हो अर्थात सत्‍तारूढ़ पार्टी के अर्थात आगे चलकर माओवादियों के राजसत्‍ता में आने की स्थिति में उनके एकाधिकार में रहे। माओवादी नेताओं गणपति, रामन्ना, गुडसा उसेंडी, किशनजी वगैरह ने समय-समय पर यह स्वीकार किया है कि उत्‍खनन होना चाहिए लेकिन आदिवासियों की वैकल्पिक बसाहट और क्षतिपूर्ति का ठीक-ठाक प्रबंध होना चाहिए। यहां ठहरकर अरुंधति से अलग हटकर माओवादियों से यह सवाल पूछा जा सकता है कि यदि सरकार के नियंत्रण और संबंधित मंत्रालयों में आवश्यक तकनीक, वित्‍तीय प्रबंध और संगठन का अभाव हो तो क्‍यों नहीं खदानें सरकारों के निर्णयों के अनुसार निजी उद्योगों को सौंप दी जाएं। फिर तो यह एक ही थैले के चट्टे-बट्टे या मौसेरे भाइयों की कथा जैसा प्रकरण हुआ।

अरुंधति द्वारा दिए गए आंकड़े दिलचस्प हैं। मैं उनकी यह बात नहीं मान सकता कि बस्तर के जंगलों में माओवादियों में 99 प्रतिशत आदिवासी हैं। हालांकि उनकी इस बात से हमें सहमत होना चाहिए कि 99 प्रतिशत आदिवासी नक्‍सली नहीं हैं। अंकगणित के लिहाज से यदि अरुंधति सही भी हों, तो भी इस पेचीदी समस्या का हल निकालने के लिए बीजगणित का सहारा लेना चाहिए। जितने भी आदिवासी नक्‍सली नेतृत्‍व के चंगुल में हैं, वे सब स्वेच्‍छा से नहीं हैं। उनका अपहरण किया गया है या उन्हें बंधक बनाया गया है। बीजापुर और दंतेवाड़ा जैसे जिले किसी अनाथालय, खुली जेल या बोर्डिंग स्कूल की तरह हैं, जहां से बाहर जाने की इजाजत नहीं है। बंदूक की नोक के दम पर आदिवासी युवजन को बंदूकें ही थमाई जा रही हैं। उन्हें हिंसा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। हिंसा औसत, पारंपरिक, सांस्कृतिक आदिवासी जीवन में एक जबरिया हस्तक्षेप है। इसलिए अरुंधति दंडकारण्‍य में नक्‍सलियों की युवा, बेलौस और बिंदास उपस्थिति में जो रोमांच अनुभव करती हैं, वह एक संवेदनशील लेखिका की नैसर्गिक प्रतिक्रिया है। जीवन का कडिय़ल यथार्थ लेकिन यह है कि वे लोग जो इंसानी संस्कृति के मानक अवयवों की तरह उपजे हैं, उन्हें जबरिया किसी हिंसा की फैक्‍टरी का मजदूर बना दिया गया है।

अरुंधति का यह कहना भी ठीक है कि जब हम अन्याय के खिलाफ किसी सेल्यूलाइड फिल्म के हीरो को प्रतिनायक की तरह आचरण करते हुए सिनेमा हॉल में देखते हैं, तो हममें भी अन्याय के खिलाफ युद्ध करने का एक हिंसक उबाल आता है। लेकिन जब ऐसी चुनौती राजनीतिक नारों के साथ बस्तर के जंगलों में गूंजती है, तो उसे हम नक्‍सली अर्थात हिंसक अर्थात अनर्गल करार देते हैं। हिंसा को लेकर निस्संदेह बहुत से प्रजातांत्रिक विमर्श हुए हैं। ये सवाल इतिहास में पहले भी उठे हैं, लेकिन अधिकतर विश्वविद्यालयों, सेमिनारों और सीमित संख्या के बुद्धिजीवियों के साथ।

आज यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि प्रजातंत्र बल्कि सभ्यता का ही क्‍या अर्थ है। अरुंधति के ऐसे दार्शनिक अंदाज निरर्थक नहीं हैं और उन्हें सतही तौर पर घृणा के साथ खारिज कर देने से कोई लाभकारी परिणाम नहीं आएगा। इतिहास यह सवाल अब हजारों बल्कि लाखों गरीबों और आदिवासियों के हलक में ठूंस रहा है। इन सवालों का उत्‍तर वक्त, प्रजातंत्र और भविष्य को देना होगा। इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। अरुंधति फिर यह ठीक कहती हैं कि ऐसे सवालों का जवाब किसी कांग्रेसी या भाजपाई सरकार या माओवादियों के पास नहीं है। यह सवाल पूरी पृथ्‍वी के अस्तित्‍व का है और विश्व के भविष्य से जुड़ा हुआ है।

जनप्रतिरोध की बानगियों का अध्‍ययन बल्कि समीक्षा करते हुए उन्होंनें भावावेश में कहा कि वे इस संघर्ष में हम जनता के पक्ष में हैं। कोई चाहे तो उन्हें जेल में डाल दे। एजेंसी के संवाददाता ने उनके भाषण के इस महत्‍वपूर्ण अंश को संदर्भ से काटकर वाक्‍यांशों में रिपोर्ट किया। जानबूझकर एक भ्रम पैदा किया। अरुंधति इस बात से भी खौफजदा हैं कि एक ओर सरकारी हिंसा की एकाधिकारवादिता जैसी थ्‍योरी का प्रचार किया जा रहा है और उसके साथ-साथ गुजरात के नरेन्‍द्र मोदी के उस चित्र का भी जिसमें मुख्यमंत्री गांधीनगर के अपने सरकारी आवास में बैठकर ए.के.-47 और एस.एल.आर. जैसे घातक हथियारों की पूजा करते दिखाए जाते हैं। यह कैसी मानसिकता है? यह सरकारी भय किसके लिए उत्‍पादित किया जा रहा है? मुझे अरुंधति के भाषण में यह सुनकर अच्‍छा लगा कि वे नहीं मानतीं कि माओवादी इस देश के गरीबों के अकेले या पहले उदधारक हैं और यह भी वह कतई माओवादी नहीं हैं। लेकिन वे यह जरूर मानती हैं कि आदिवासियों का नेतृत्‍व करते माओवादी अपने अनुयायियों का विश्वास खंडित नहीं करना चाहते।

यह फिर एक विचारणीय लेकिन विवादास्पद तर्क है। माओवादी अपने सिद्धांतों के प्रसरण के लिए मनुष्य संख्या के रूप में आदिवासियों का साथ ले रहे हैं अथवा वे आदिवासी जन-जीवन की चौतरफा समृद्धि के लिए लचीली, तार्किक, परिवर्तनशील और संभावनायुक्त वैचारिकता तथा मानवीयता पर भरोसा करते हैं। यदि वे आदिवासियों की कारपोरेट दुनिया द्वारा की जा रही लूट के खिलाफ हैं, तो वे उन दूसरे आदिवासियों की असहमति का सम्मान क्‍यों नहीं करते जो नक्‍सली तौर- तरीकों को समर्थन नहीं देते, या उनका भी जो कथित नव- पूंजीवाद से लुटने को तैयार बैठे हैं। समर्थक आंकड़ों की अंकगणित से खेलना माओवाद का घिनौना उदाहरण है जो चीन की धरती ने अपनी छाती पर लिख लिया है। वहां लाखों लोग मौत के घाट उतारे गए हैं। जो मरे और जिन्‍होंने हत्‍याएं कीं, उनके सांस्कृतिक चरित्र भारतीय आदिवासियों से विलग रहे हैं।

समर्थन और विरोध का यह कैसा तिलिस्म है जो सरकारों को उत्‍तेजित करता है कि वे मजबूर बस्तरिहा आदिवासियों का कत्‍लेआम करने के लिए नागा, मिजो, असमिया, मणिपुरी, नेपाली आदिवासी सैनिकों को बस्तर के जंगलों में इसलिए ठेल दें क्‍योंकि वे तथाकथित गुरिल्‍ला युद्ध शैली में पारंगत हैं। नक्सकलवाद का गोमुख नक्‍सलबारी समय के प्रवाह में अब भी बर्फ का जमा हुआ संस्करण है। भारतीय इतिहास की सांस्कृतिक नदी गंगा को लाशों, चमड़ों के कारखानों, रसायनों और मल-मूत्रों से प्रदूषित कर दिया गया है। उसी तरह माओवाद की यात्रा भी अनावश्यक हत्‍याओं, अपहरणों, बलाल्‍कारों, डकैतियों, धन उगाहियों, यथास्थितिवाद के पोषण और पूंजीवाद के माओवादी समानांतर से प्रदूषित हो गई है। अच्‍छा हो यदि अरुंधति इस पक्ष पर भी कभी विस्तार से लिखें।

अरुंधति ने यह भी तो कहा है कि 'नर्मदा बचाओ' आंदोलन जैसे लोकप्रिय प्रकरण के नेताओं के पास सार्थक दृष्टिबोध तो रहा है लेकिन कारगर रणनीति नहीं। इसके बरक्‍स माओवादियों के पास कारगर रणनीति तो है लेकिन भविष्यमूलक दृष्टिबोध नहीं। क्‍या इससे यह राजनीतिक सवाल उठ खड़ा नहीं होता कि जो महाभारत के युद्ध में धृतराष्ट्र है उसे ही कौरव पक्ष करार दिया जाए। चाहे वह सरकार हो या माओवादी। जो पांच गांव मांगने की तरह ही संतुष्ट हैं क्‍या वे आदिवासी पांडव परंपरा के नहीं हैं? यदि अरुंधति के वाक्‍यांश का समकालीन अर्थ बूझा जाए तो धृतराष्ट्र को माओवादी तथा सरकार का डबल रोल करना पड़ रहा है। फिर अरुंधति नक्‍सलियों पर तमाम तरह के आरोप लगाते हुए भी उन्हें आदिवासियों के पांडवी हमदर्द समझकर माओवाद में गीता के निष्काम कर्म तथा स्थितप्रज्ञता के तर्कों को प्रखरता से क्‍यों तलाश करती हैं? माओवादी निश्चित तौर पर जिद्दी और असहिष्णु हैं और उनमें विचारों की मुर्गी की एक टांग है। इसमें भी कोई शक नहीं कि उनका शत्रु अर्थात विश्व पूंजीवाद पूरी दुनिया को एक राक्षसी बाजार के रूप में तब्‍दील कर रहा है।

अरुंधति कहती हैं कि माओवादी पूंजीवादी व्यवस्था से इसलिए लड़ पा रहे हैं क्‍योंकि वे उस वैचारिक दर्शन के बाहर हैं। यह तो माओवाद का पुराना संस्करण है जब दुनिया में वैश्विक पूंजीवाद का वाइरस नहीं घुसा था। आज खुद चीन में क्‍या हो रहा है। भारतीय माओवादियों के पास कोई मौलिक विचार-दर्शन नहीं है। वे तो माओत्‍सेतुंग की रेलगाड़ी के डिब्‍बे हैं। इंजन तो बीजिंग में ध्‍वस्त हो चुका है । उसको सुधारने के लिए अमेरिकी कल-पुर्जों की दुकान खुद चीन ने खोल ली है। ऐसे में यदि माओवादी उनके अनुसार सत्‍ता में आ भी गए तो क्‍या वे नई दिल्‍ली को बीजिंग बना देंगे। तब उन वायदों का क्‍या होगा जो माओवादी नक्‍सली रूप धरकर आदिवासियों से आज कर रहे हैं। यदि उनमें मौलिक सोच होता तो कहते कि उन्होंनें माओ से प्रेरणा भले ग्रहण की हो, लेकिन उनका रास्ता भारतीय साम्यवाद का है। इसी वजह से माक्‍सवादी विचारक भगत सिंह ने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता नहीं ली थी।

लेनिन की क्रांति गोर्बाच्‍योव की प्रतिक्रांति में पहुंची है। भारतीय साम्यवाद की पूरी यात्रा चल तो रही है लेकिन पाथेय उसे मिलता नहीं है। कोल्हू के बैल की तरह चलने से दलहन से तेल तो निकलता है लेकिन बेचारे बैल कहीं नहीं पहुंच पाते। उस पर तुर्रा यह कि उनके मुंह और आंखों पर पट्टियां बंधी होती हैं। अरुंधति राय इस सामान्‍य अवधारणा का प्रतिरोध करती हैं कि देश में कुछ लोग उथल-पुथल या अशांति पैदा करते हैं जिसे खत्‍म करने की जिम्मेदारी सरकार की है। इसलिए सरकार को हिंसा और दमन के माध्‍यम चुनने होते हैं। उनका कहना है कि इसके ठीक उलट यह देश की सरकार है जिसे आम जनता के खिलाफ स्वयं के द्वारा उत्‍पन्न किए गए कारणों से युद्ध लडऩा पड़ता है। यदि सरकार-जनित ये सामाजिक राजनीतिक आर्थिक कारण नहीं होंगे, तो हिंसा का यह द्वंद्व शायद न्‍यूनतम हो। उनके अनुसार इतिहास में कई देशों में इस तरह की परिस्थितियां उत्‍पन्न होती रहीं, जब खुद शासन का नियम जनता के विरुद्ध आक्रामक और उग्र रहा आया है। भारतीय लोकतंत्र भी इसका अपवाद नहीं है। उसे जिस तरह चलाया जा रहा है उसके सफल संचालन के लिए इस तरह की यौद्धिक परिस्थितियां पैदा करना लाजमी समझा जाता है।

इस देश में हर एक अहिंसक दमदार आंदोलन को सरकार द्वारा माओवादी करार देना राजनीतिक फैशन या रणनीति है। इस देश के वे लोग जो अन्याय का प्रतिकार करते हैं और हर कीमत पर चाहे हिंसक या अहिंसक तरीके हों अपनी भूमियों के जबरिया अधिग्रहण का प्रतिरोध करना चाहते हैं उन पर माओवादी होने का तमगा लटका दिया जाता है। 1989 में जब पूंजीवाद ने अफगानिस्तान में कम्युनिज्‍म के खिलाफ लड़ाई जीती तो पूरी दुनिया में प्रति क्रांति का दौर शुरू हुआ। दुनिया के सारे मुल्क खामोश रहे। भारत जैसा गुटनिरपेक्ष देश भी पूंजीवाद के विरुद्ध कुछ नहीं बोला। इस घटना के बाद भारत सरकार ने दो ताले खोले। एक तो उसने बाबरी मस्जिद-राम मंदिर का ताला खोला और दूसरा उसने दुनिया के सभी देशों के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे का ताला खोल दिया। इन दोनों अर्थात हिन्‍दू कठमुल्‍लापन और बाजार के फंडामेंटालिज्‍म को कायम रखने बल्कि सफल बनाने के लिए दो तरह के आतंकवाद पनपाए गए। एक इस्लामी आतंकवाद और दूसरा माओवादी आतंकवाद।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री चिदंबरम का यह सोचना है कि एक विकसित भारत में 85 प्रतिशत जनता को शहरों में रहना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि देहाती इलाकों से तकरीबन 50 करोड़ लोगों को शहरों की ओर ठेलना होगा तब ही उनका यह सपना संभव होगा। समाज में कारपोरेट दुनिया के द्वारा किया जा रहा विज्ञापन और प्रचार लोगों के जेहन में और खासकर मध्‍यवर्ग के जेहन में ऐसी बातें भर रहा है जो पूरी तौर पर अव्यावहारिक, काल्पनिक, असामाजिक और वर्गीय सामंजस्य विरोधी हैं। लेकिन बाजार की ये शक्तियां राजनीतिक शक्तियों के साथ मिलकर लगातार आगे बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए दिल्‍ली में राष्टकुल खेल हो रहे हैं। इनमें तीस हजार करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। अठाईस सौ करोड़ रुपए तो केवल इन खेलों के शुरूआती अभ्यासों के लिए खर्च हो जाएगा। दिल्‍ली की बहुत बड़ी आबादी से जगहें खाली कराई जा रही हैं। गांव से खदेड़ी गई झोपडिय़ां और घर शहरों के अंदर झुग्‍गी झोपडिय़ों के हुजूम में तब्‍दील हो जाती हैं। ऐसी अमानवीय स्थितियों में उन्हें रहना पड़ता है जिसकी कल्पना नही की जा सकती।

मैं अरुंधति की इस केन्‍द्रीय चिंता से फिर सहमत हूं कि सभ्य नागरिक समाज को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि आदिवासियों को खानाबदोश बना दिए जाने से नागर सभ्यता पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। अरुंधति में यह भी रोमानी आत्‍मविश्वास है कि आदिवासी इस लड़ाई में कभी पराजित नहीं होंगे। यह बेहद महत्‍वपूर्ण है कि विश्व पूंजीवाद के दानव से लडऩे का सबसे बड़ा साहस आदिवासी दिखा रहे हैं। वे यह नहीं समझते कि पूंजीवाद क्‍या है। वे राजनीतिक व्यवस्थाओं को नहीं जानते। उन्हें यह नहीं मालूम है कि भारत क्‍या है और उसकी भौगोलिक सीमाएं क्‍या हैं। लेकिन वे यह जरूर जानते हैं कि जंगल उनका है। नदियां, पहाड़, पशु पक्षियों का कलरव, रत्नगर्भा धरती के अवयव, ग्राम्य जीवन की लाक्षणिकताएं सब कुछ उनका है। बड़े कारखानों, खदानों, उद्योगपतियों, सरकारों, नेताओं, नौकरशाहों, व्यापारियों और बुद्धिजीवियों के जरिए उनका विकास हो सकता है। ऐसा भी वे नहीं समझते। संविधान, लोकतंत्र, चुनाव, मंत्री परिषद, न्यायपालिका, पुलिस मशीनरी वगैरह की मदद से यदि उनके जीवन में कोई ढांचागत परिवर्तन किया जाएगा तो वे किसी भी हालत में अपने अधिकारों के लिए आखरी सीमा तक लडऩे मरने को प्रतिबद्ध रहेंगे।

अपनी अंतरात्‍मा का इतना संदेश वे अब भी बूझते समझते हैं। यदि एक बार आदिवासियों ने ठान लिया कि उन्हें उनकी जड़ों से उखाड़ा नहीं जा सकता तो दुनिया की कोई भी वैश्विक बाजारवाद या सरकार की ताकत ऐसे आदिवासियों को पराजित नहीं कर सकेगी। इतिहास का यथार्थ क्‍या है? पूरा भारत अपने दब्‍बू स्वभाव के कारण कई बार पराजित नहीं हुआ है? सदियों पुराने विदेशी आक्रान्‍ता घने जंगलों के कारण आदिवासियों तक नहीं पहुंच पाए। इसलिए आदिवासी संस्कृति स्वायत्‍त बनी रही। उन दिनों वनों को तबाह करने, खनिजों को उत्‍खनित करने, नदियों पर बांध बनाने की कोई औद्योगिक सभ्यता पनपी ही नहीं थी। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सोने चांदी के जूते तो भारतीय राजनेता आज अपनी छातियों पर तमगों की तरह लटकाए घूम रहे हैं। आदिवासी कब तक उनसे बच पाएंगे? जिस हुकूमत के पास विस्थापित आदिवासियों की वैकल्पिक बसाहट के लिए भूमियां उपलब्‍ध नहीं हैं, उसी सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लिए एक सौ चालीस हजार हेक्‍टेयर भूमि कहां से ढूंढ़ ली-यह भी अरुंधति का ही तर्क है।

राजनांदगांव के एक कवि का उन्होंनें मोहक उल्‍लेख किया है। उसके अनुसार मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र खून में उतरे हुए विष की तरह है। उलटबांसी का प्रयोग करते हुए अरुंधति कहती हैं कि यह कैसा विरोधाभास है कि पाकिस्तान जैसा सैनिक तानाशाही में अमेरिका की वजह से फंसा देश लोकतंत्र के लिए ललक रहा है और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत अपने राजनेताओं की वजह से जनता से युद्ध करता हुआ सैन्‍य तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान की ललक तो इतिहास-सम्मत है और इसलिए वांछनीय भी। लेकिन भारतीय शासन व्यवस्था में सैन्‍य तानाशाही के लक्षण फिलहाल तो कुलबुलाते नहीं दिखाई देते। लचर लोकतंत्रीय व्यवस्थाओं के चलते सरकारें अनुकूल प्रशासनिक निर्णय नहीं कर पाती हैं। माओवादियों ने सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्‍या क्‍या कर दी, पूरे देश के नेता राजनीतिक विचारों की नेट प्रैक्टिस करने लगे। मंत्रीपरिषद की गोपनीय बातें अखबारों में छपने लगीं। दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां अपने घाव सुखाने और दूसरे के दिखाने लगीं। सेना के अफसर विरोधाभासी बयान देने लगे। केन्‍द्र और राज्‍य की समझ का अलगाव नक्‍सलियों की अप्रत्‍यक्ष मदद करता रहा। पुराने पेंशनयाता अफसरों की रोजी-रोटी चलने लगी।

नहीं लिखने को रचनात्‍मक मीडिया कर्म समझा जाने लगा। एक छोटी सी घटना ने निर्णय बुद्धि की चूलें हिला दीं। बंगाल के दो गांव-क्षेत्र में नैनो कार के पलायन ने पूरी राज्‍य व्यवस्था को ताश के पत्‍तों की तरह फेंट दिया। जो साम्यवाद पिछले चालीस वर्षों से जन्‍मघुट्टी की तरह बंगाल के युवा वर्ग को चटाया जा रहा था, वह एक जन्‍मगत ब्राम्हण तथा कर्मगत क्षत्री के उग्र तेवर के सामने काफूर हो गया। ऐसे में यह कैसे माना जाएगा कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था या कार्यपालिका के जेहन में सैन्‍य तानाशाही के कीड़े बिलबिला रहे हैं। कारपोरेट दुनिया के वैभव का चमत्‍कार भारतीय राजनेताओं के लिए निस्संदेह एक अनोखा अनुभव है। उसमें वे डूबे रहना चाहते हैं-यह तो कहा जा सकता है। देश के शीर्ष कवि विनोद कुमार शुक्‍ल ने मेरी पुस्तक 'बस्तर: लाल क्रांति बनाम ग्रीन हंट' की भूमिका में यह कविता लिखी है जो भाषा की उग्रता के बिना एक अवसाद हममें संवेदनशीलता के साथ रचती है:

जो प्रकृति के सबसे निकट हैं
जंगल उनका है
आदिवासी जंगल के सबसे निकट हैं
इसलिए जंगल उन्‍हीं का है।
अब उनके बेदखल होने का समय है
यह वही समय है
जब आकाश से पहले
एक तारा बेदखल होगा
आकाश से चांदनी
बेदखल होगी-
जब जंगल से आदिवासी
बेदखल होंगे।
जब कविता से एक एक शब्‍द
बेदखल होंगे।

कनक तिवारी

अभी अलविदा ना कहो दोस्‍तों .....

पिछले दिनों गुप्‍ता जी ने पूरे मनोयोग से एक पोस्‍ट लिखा था गुलाम भारत के सपूतो मे आजादी पाने का जुनून जो करतार सिंह जी पर आधारित था, जिसमें दो टिप्‍पणियां आई. उसके बाद उन्‍होंनें इसी पोस्‍ट पर आधारित एक पोस्‍ट लिखा लगदा है तुसि, किसे नु न इ लगदे प्यारे इस पोस्‍ट पर श्‍याम कोरी 'उदय' जी के धका-धक कमेंट आये और कमेंट में उन्‍होंनें लिखा कि 'लो भाई जी ये पोस्ट ... चिट्ठाजगत में ऊपर चढ गई'  मैंनें भी वर्तमान परिस्थितियों में फीड एग्रीगेटरों में पसंद-नापसंद आदि के द्वारा पोस्‍टों को उपर चढ़ाने के ट्रिक को आम करने के लिए मजाकिया कमेंट किया 'सिद्ध हो गया पोस्‍ट को उपर चढ़ाने के लिए जुगाड़ तोड़. जय हो.' और इसे अपने इस ब्‍लॉग में एक पोस्‍ट बनाकर लगा दिया और यह पोस्‍ट एग्रीटर हॉट लिस्‍ट में चढ भी गया, यह भी एक ट्रिक यानी जुगाड़ तोड था.

संभवत: गुप्‍ता जी को मेरा यह पोस्‍ट लगाना अच्‍छा नहीं लगा, उन्‍होंनें पोस्‍ट लगाया अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे जिसमें उन्‍होंनें मेरे इस तथाकथित कृत्‍य के कारण हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को अलविदा कह टंकी मा जा बैठे(ब्‍लॉगिंग भाषा में). यद्धपि मैंनें वहां अपना स्‍पष्‍टीकरण दिया है कि मेरे पोस्‍ट लगाने से किसी की भी कोई मान हानि नहीं हुई है. ना ही मैने पोस्‍ट लगाकर कोई गलती की है.

आदरणीय आपकी भावनाओं को मेरे इस कार्य से जो चोट पहुची है उसके लिए मैं यहां एक बार पुन: क्षमा चाहता हूं,  आप हिन्‍दी ब्‍लागजगत में वापस आयें, और अपने उमड़ते घुमढ़ते विचार निरंतर प्रस्‍तुत करें.

उमड़त घुमड़त विचार वाले सूर्यकान्त गुप्ता जी के ब्‍लॉग प्रयासों से आप सभी परिचित होंगें. सूर्यकांत गुप्‍ता जी के संबंध में ललित शर्मा जी नें अपने ब्‍लॉग में यहां एक पोस्‍ट लिखा है जिसमें श्री गुप्‍ता जी के बहुआयामी और अनुकरणीय व्‍यक्तित्‍व के पहलुओं से परिचित हुआ जा सकता है.

विशेष टीप :-  श्री श्‍याम कोरी 'उदय' जी नें उसी पोस्‍ट  अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे में श्री गुप्‍ता जी को 'भड़काने' वाले को देख लेंगें कहकर मुझको प्‍यारी सी घुड़की दी है जो सही है  'उदय' जी ने ना ही मुझे देखा है और मैनें भी 'उदय' जी को नहीं देखा है, :) वक्‍त आयेगा तो जरूर देखेंगें. फिलहाल हैप्‍पी ब्‍लॉगिंग.

सास गारी देवे - राहुल सिंह

दिल्ली-6 पर मिली टिप्पणियों के बाद 'सास गारी ... ' पारंपरिक छत्तीसगढ़ी लोक गीत का मूलतः रिकार्डेड 'ऑडियो' और 'टेक्स्ट' देना जरूरी लगा, इसी दौरान एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में फिर से यह गीत आया है। हबीब तनवीर जी की टीम द्वारा गाये इस गीत के बोल हैं -

सास गारी देवे, ननंद मुंह लेवे, देवर बाबू मोर।
संइया गारी देवे, परोसी गम लेवे, करार गोंदा फूल।
केरा बारी में डेरा देबो चले के बेरा हो॥
आए बेपारी गाड़ी म चढ़िके।
तोल आरती उतारव थारी म धरिके हो॥ करार...
टिकली रे पइसा ल बीनी लेइतेंव।
मोर सइकिल के चढ़इया ल चिन्ही लेइतेंव ग॥ करार...
राम धरे बरछी लखन धरे बान।
सीता माई के खोजन बर निकलगे हनुमान ग॥ करार...
पहिरे ल पनही खाये ल बीरा पान।
मोर रइपुर के रहइया चल दिस पाकिस्तान ग॥ करार...

पूरा आलेख व मूल आडियो सुनने के लिए राहुल सिंह जी के ब्‍लॉग सिंहावलोकन में चटका लगांए एवं अपनी टिप्‍पणी वहीं देवें.  

संजीव तिवारी

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छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र में प्रकाशित कनक तिवारी जी के आलेख 'कामरेड  ! इसे भी पढ़ें  ..  !' को हमने इस ब्‍लॉग में पिछले दिनों प्रकाशित किया था जिस पर प्राप्‍त अली सैयद जी एवं शेखावत जी की टिप्‍पणियों को छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र नें आज प्रकाशित किया है कतरन देखें -


संजीव तिवारी

कामरेड ! इसे भी पढ़ें .. !

राज्‍यपाल यदि चाहें तो आदिवासियों की निजी भूमियों को छिनने से रोक लगा सकते हैं- जो वे लगाते नहीं हैं। वे चाहें तो कई अधिसूचनाएं और विनियम भी जारी कर सकते हैं जिससे आदिवासी के लिए जल, जंगल और जमीन सुरक्षित रहे। यदि वे ऐसा कर देते हैं तो आदिवासियों की आधी चिंताएं अपने आप दूर हो सकती हैं। हथियारों से फूल नहीं झरते न बारिश होती है। नक्‍सली संविधान में विश्‍वासस नहीं करते, न लोकतंत्र में और न ही भारतीय परंपराओं में। आदिवासी इलाकों में उनकी जमीनें छिनने से रोकना एक संवैधानिक हथियार है। उसे चलाने से नक्‍सलियों को संविधान भी नहीं रोकता। लेकिन हथियार तोप, गोला, बम, बारूद या लैंडमाइन से नहीं। जो संविधान अधिकारों की परिभाषा देता है, वही उनके छिनने से रोक के लोकतंत्रीय रास्ते भी बताता है। इन रास्तों का इस्तेमाल नक्‍सली क्‍यों नहीं करते? यदि ये रास्ते कारगर नहीं हों तो फिर इनको ही सुधारने की बात भी क्‍यों नहीं करते? संवैधानिक उपचारों का विकल्प हथियार कब से होने लगे? हथियारों के उपयोग को खत्‍म या न्‍यूनतम करने के लिए ही तो संविधान और लोकतंत्र बने हैं।

यह आलेख आज के छत्‍तीसगढ़ में प्रकाशित है, हम इसे छत्‍तीसगढ़ से साभार प्रकाशित कर रहे हैं. संपूर्ण लेख पढ़ने के लिए नीचे दिये फोटो को क्लिक करें ............


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