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राज्‍यपाल यदि चाहें तो आदिवासियों की निजी भूमियों को छिनने से रोक लगा सकते हैं- जो वे लगाते नहीं हैं। वे चाहें तो कई अधिसूचनाएं और विनियम भी जारी कर सकते हैं जिससे आदिवासी के लिए जल, जंगल और जमीन सुरक्षित रहे। यदि वे ऐसा कर देते हैं तो आदिवासियों की आधी चिंताएं अपने आप दूर हो सकती हैं। हथियारों से फूल नहीं झरते न बारिश होती है। नक्‍सली संविधान में विश्‍वासस नहीं करते, न लोकतंत्र में और न ही भारतीय परंपराओं में। आदिवासी इलाकों में उनकी जमीनें छिनने से रोकना एक संवैधानिक हथियार है। उसे चलाने से नक्‍सलियों को संविधान भी नहीं रोकता। लेकिन हथियार तोप, गोला, बम, बारूद या लैंडमाइन से नहीं। जो संविधान अधिकारों की परिभाषा देता है, वही उनके छिनने से रोक के लोकतंत्रीय रास्ते भी बताता है। इन रास्तों का इस्तेमाल नक्‍सली क्‍यों नहीं करते? यदि ये रास्ते कारगर नहीं हों तो फिर इनको ही सुधारने की बात भी क्‍यों नहीं करते? संवैधानिक उपचारों का विकल्प हथियार कब से होने लगे? हथियारों के उपयोग को खत्‍म या न्‍यूनतम करने के लिए ही तो संविधान और लोकतंत्र बने हैं।

यह आलेख आज के छत्‍तीसगढ़ में प्रकाशित है, हम इसे छत्‍तीसगढ़ से साभार प्रकाशित कर रहे हैं. संपूर्ण लेख पढ़ने के लिए नीचे दिये फोटो को क्लिक करें ............


5 comments:

  1. मगर पढ़ेंगे कहां ससुरे।
    http://udbhavna.blogspot.com/

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  2. विस्तृत विचारणिय आलेख.

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  3. नक्सलियों को आदिवासियों की चिंता थोड़े ही है जो वे यह पढ़े !
    उन्होंने ने तो आदिवसियों के कंधे पर बन्दुक रख कर सत्ता प्राप्त करनी है ताकि वे अपनी तानशाही कायम कर सके |

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  4. ( संजीव भाई , अपरिहार्य कारण थे समय पर हाजिर नहीं हो पाये ! )


    क्या ये सही है कि संविधान को ख़ारिज कर चुके लोगों से संवैधानिक प्रावधानों के लागू किये जाने की मांग करने जैसी अपेक्षा की जाये ? एक पक्ष आप - जो संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत आदिवासियों / जनगण के कल्याण की बात करते हैं , शासन जो इन प्रावधानों के प्रति उदासीन है... या कि जानबूझकर ऐसा कर रहा है किन्तु संविधान का ब्रांड अम्बेसडर है और दूसरा पक्ष - नक्सलवादी , जिनका संविधान में विश्वास ही नहीं है , बहस की सुविधा के लिए इनके साथ अरुंधति राय जैसे मित्रों को भी गिन लिया जाये ! गौर से देखूं तो उभयपक्ष आदिवासी / जनगण कल्याण के दावेदार हैं , एक संविधान के दायरे में और दूसरा इसके बाहर ! एक के पास भजन पूजन के लिये पवित्र संविधान तो है पर उसे लागू करने का कोई कमिटमेंट नहीं और दूसरे के पास रास्ता- ए- बुलेट सह संविधान विरोध (ख़ारिज शब्द ज्यादा सही ) है ! बहुत आसान है कि अरुंधति राय को नक्सलियों के प्रति उनके समर्थन / हमदर्दी के एवज में तथा संविधान के प्रति अप्रत्यक्ष रूप से अनास्था प्रदर्शन करने के नाम से अन्दर कर दिया जाये , किन्तु यह समस्या का हल तो नहीं है ! अगर वे नक्सलियों का पक्ष रख रही हैं और आप संवैधानिक प्रावधानों का तो क्यों ना इसे दो विपरीत ध्रुवों / विचारधाराओं / पक्षों / यहां तक की शत्रुओं के मध्य संवाद की शुरुआत के संकेत बतौर देखा जाये ! असहमतियों का विलोपन , सहमतियों का उदभव , मुमकिन है भीषण / भयंकरतम / सबसे कठिन बारगेनिंग के रास्ते आये किन्तु यह संवाद के बिना संभव है क्या ? ( ...ओह ...लगता है कमबख्त विद्युत् व्यवस्था भी संवाद के विरोध में है ) आदरणीय तिवारी जी उभयपक्षीय अपेक्षायें ...उत्तर... दक्षिण... हैं किन्तु घोषित उद्देश्य केवल एक , जनकल्याण , अतः मुझे अपना कथन संवाद पर ही रोकना होगा !

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