चिनहा

चिनहा - संजीव तिवारी

कईसे करलाई जथे मोर अंतस हा
बारूद के समरथ ले उडाय
चारो मुडा छरियाय
बोकरा के टूसा कस दिखत
मईनखे के लाश ला देख के
माछी भिनकत लाश के कूटा मन
चारो मुडा सकलाय
मईनखे के दुरगति ला देखत
मनखे मन ला कहिथे
झिन आव झिन आव
आज नही त काल तुहूं ला
मईनखे बर मईनखे के दुश्मनी के खतिर
बनाये बारूद के समरथ ले उडाई जाना हे

हाथ मलत अउ सिर धुनत
माछी कस भनकत
पुलिस घलो कहिथे
झिन आव झिन आव
अपराधी के पनही के चिनहा मेटर जाही

फेर में हा खडे खडे सोंचथौं
जउन हा अनियाव के फौजी
पनही तरी पिसाई गे हे
तेखर चिनहा ला कोन मेटार देथे ?
मईनखे बर मईनखे के स्वारथ खातिर !

(१९९३ के बंबई बम कांड के दूसरे दिन दैनिक भास्कर के मुख्य पृष्ट पर प्रकाशित)

छतीसगढी लघु कथा : कोंन नामवर सिंह ?

पुन्नी के दिन मोर घर सतनरायेन के कथा होये रहिस. वोमा मोर परोसी बलाये के बाद घलव नई आये रहिस. मोर सुवांरी बने मया कर के परसाद ल मोर टेबल में माढे कागज में पुतिकिया के रौताईन (शहर में काम करईया बाई मन ल हमन अपन मन मढाये बर अईसनहे रौताईन कथन काबर कि बम्हनौटी बांचे रहे कहि के) के हांथ परोसी के घर भेज दिस.

कथा पूजा के बाद मैं हर हरहिंछा उपरोहिता बाम्हन ल दान दक्षिणा देके बने खुश करा के अउ टें टें के अपन आप ल बकिया तिवारी वेदपाठी बाम्हन बतात बतात उपरोहिता बाम्हन के चेहरा म अपन आप ल एक आंगुर उपर बैठारत भाव ल खोजत अपन कुर्सी टेबल म बैठेंव त मोर होश उठा गे.

मोर जम्मो लिखना ल तो मोर सुवांरी बोहायेच दे रहिस फेर मोर इंदौर के इतवारी भास्कर में छपे जुन्न्टहा एक ठन कहानी के बारे म टीका टिपनी डा नामवर सिंह हा मोला भेजे रहिस तउन चिट्ठी ला मैं ह अपन टेबल के उपरेच में रखे रेहेंव काबर कि कथा सुनईया अवईया मन ह ओला देखही त मोर बर उखर सम्मान बाढही कहि के,

टेबल ले चिटठी गायब ! घर के जम्मो मनखे मन ल पूछ डारेंव पता चलिस परसाद ह चिट्ठी के पुतकी म बंधा के परोसी घर पहुंच गे हे तुरते परोसी घर चल देंहेंव फेर कईसे कहंव परसाद ल वापस कईसे मांगव दरवाजा म खडे गुनत रहंव तईसनहे बद ले परसाद के पुतकी ह बाहिर खोर म गिरीस परोसिन ह बडबडा बडबडा के परसाद ल फेंक दिस, मैं मारे खुशी के पुतकी कोती दौंडेव ओखर पहिली ले कुकुर ह टप्प ले पुतकी ल झोंक लिस मोर हात हुत कहत ले पुतकी तार तार होगे.

बडका कोहा उठायेंव अउ कुकूर के मूडे ल देंव ! कांय कांय !

मोर अंतस रो दिस वो चिट्ठी ल मैं हर अपन बीते दिनन के निसानी के रूप म रखे रेहेंव हाय !
घर लहुट गेंव कुकुर के कांय कांय बंद नई होईस

घर आके सोंचेंव वा रे सतनरायेंन के भगत
तोर धरवाली परसाद वोला दिस जेखर मन म भगवान बर सरधा नई हे
वुहु परोसी भगवान के परसाद ल फेंक दिस लीलावती कलावती कनिया के कहिनी से बेखबर
कुकुर बड सरधा से खात रहिस वो का जानैं बिचारा कि परसाद ह मोर सम्मान में बंधाये हे
मैं कथा कहवईया ह वोला मार देंव नई खान देंव
फेर वो कुकूर बिचारा का जानैं
कोंन नामवर सिंह अउ कोन लीलावती ?

संजीव तिवारी

सुरहुत्ती

सुरहुत्ती - संजीव तिवारी

कहां ले बरही मनटोरा
तोर तेल बिन दिया ह
सुरहुत्ती के दिया ह दाउ मन बर ये
मोर करम म त सिरिफ
मोर मेहनत के चूहे तेल
अउ महाजन के कर्जा देहे दाना के बाती हे
जउन हा पेट के करिया रात ला
बुग बुग बर के अजोरत हे
अउ उही अंजोर म
मोर लछमी बूढी दाई
चूरी पहूंचा पहिरे
दुवारी दुवारी
कांसा के पुरखौती थारी मा
दीया सजाये
कभू ढाबा त कभू कोठी
त कभू कोठार म
दीया बांटत दिखत हे !

छत्तीसगढ थापना परब अउ बुचुआ के सुरता

बुचुआ के सुरता (छत्तीसगढी कहानी) संजीव तिवारी

बुचुआ के गांव म एक अलगे धाक अउ इमेज हे, वो हर सन 68 के दूसरी कक्षा पढे हे तेखरे सेती पारा मोहल्ला म ओखर डंका बाजथे । गांव के दाउ मन अउ नवां नवां पढईया लईका मन संग बराबर के गोठ बात करईया बुचुआ के बतउती वो हर सन 77 ले छत्तीसगढ राज के सपना संजोवत हे तउन ह जाके 2000 म पूरा होये हे ।

सन 1977 म मनतरी धरमपाल गुप्ता के झोला मोटरा ल धरईया बुचुआ ह शहर अउ गांव म मेहनत करत करत 30 साल म छत्तीसगढ के बारे म जम्मो जानकारी ल अपन पागा म बंधाए मुडी म सकेल के धरे हे, नेता अउ कथा कहिनी लिखईया घर कमइया लग लग के ।

छत्तीसगढ के जम्‍मो परब तिहार, इतिहास अउ भूगोल ला रट डारे हे । कहां नंद, मौर्य, शंगु, वाकाटक, नल, पांडु, शरभपुरीय, सोम, कलचुरी, नाग, गोड अउ मराठा राजा मन के अटपट नाव ला झटपट याद करे रहय । रतनपुर अउ आरंग के नाम आते राजा मोरध्वज के कहनी ला मेछा म ताव देवत बतावै । गांव म नवधा रमायन होवय त बुचुआ के शबरीनरायन महात्तम तहां लव कुश के कथा कहिनी ला अईसे बतावै जईसे एदे काली के बात ये जब छत्तीसगढ म लव कुश जनमे होये ।

भागवत कथा सुने ल जाय के पहिली बीर बब्रूवाहन के चेदिदेश के कथा सुनावै अउ मगन होवय कि वोखर छत्तीसगढ हर कतका जुन्‍ना ये । लीला, नाचा, गम्‍मत होतिस त बुचुआ ह कवि कालीदास के मेघदूत के संसकिरित मंतर के टूटे फूटे गा के बतावै कि सरगुजा म संसार के सबले पुराना नाटक मंच हे जिहां भरत मुनि ह सबले पहिली राम लीला खेलवाए रहिसे । वोखर रामगिरी के किस्‍सा ल सुन के नवां पढईया टूरा मन बेलबेलातिन अउ बुचुआ संग टूरा मन पथरा म लिखाए देवदासी अउ रूपदक्ष के परेम कहानी ला सुनत सुनावत ददरिया के तान म मगन हो जातिस ।

कोनो ल पुस्‍तक देखतिस तभो शुरू हो जतिस भाई रे हमर छत्‍तीसगढ म छायावाद के पहिली कविता कुकरी कथा लिखे गे रहिसे, इन्‍हें ले पहिली हिन्दी किस्सा हा जागे रहिसे । तहां ले कालिदास के संसकिरित चालू हो जातिस । पुस्‍तक धरईया कुलेचाप हूं, हां कहत टसक मारतिस ।

अडबड किस्सा हे गांव म बुचुआ के पूरा पुरान ये छत्तीसगढ के । सन अउ तारीख संग छत्तीसगढ अंदोलन के दिन बादर के उतार चढाव ला मुअखरा बुचुआ मेर पूछ लेवव । थोरकन बात ला खोल भर तो देव, तहां बुचुआ के पोगा चालू, बीच बीच म बेटरी चारजिंग बर चोगीं माखुर भर देत रहव । हार थक के सुनईया मन ला जुर मिल के कहे ल लागय ‘जय छत्तीसगढ’ ‘जय छत्तीसगढ’ । तहां ले जय कहे के भोरहा म बुचुआ के धियान हा भरमावै तहां ले बात ल सम्हारे बर तीर बईठे कोनो सियान हा बुचुआ ल टप ले पूछै ‘चमरासहिन डोली के धान कईसे हे बाबू ‘ तब जाके बुचुआ के महात्‍तम सिरावै ।

बुचुआ के बिहई बुधियारिन ला बुचुआ के बात ल हंसी ठ्ठा म उडावत देख के, अडबड दुख होवै, फेर बुचुआ ये, कि वोला कुछु फरके नई परय । वो तो अपन छत्‍तीसगढ महतारी के सिरतोन बेटा, महिमा गाये ल छोडबेच नई करय, कोनो हांसै कि थूंकै ।

आज बुचुआ ला बिहिनिया बिहिनिया नहा धो के मार चिकचिक ले तेल चुपरे, नवां बंगाली तेखर उपर मा जाकिट मारे, नवां पचहथ्थी धोती संग बजनी पनही पहिरे । चरर चरर खोर म किंजरत देख के बुधियारिन कहिथे ‘का हो आज सुरूज बुडती डहर ले उही का, बिहिहनया ले मटमट ले सम्हर र ‍हर पखर के कहां जाए बर सोंचत हौ, ओलहा जोंते बर नई जाना हे का, जम्मा ओल सिरा जही त सुरता करहू ।‘

बुचुआ के बजनी पनही के चुरूर चुरूर थम गे, करिया तश्‍मा ला माई अंगरी मा नाक कोती खरकावत बुचुआ कथे ‘अरे छोटकी के दाई नई जानस का ओ आज हमर छत्तीसगढ राज के जनम दिन ये, तेखर सेती रईपुर जए बर तियार हौं बीस ठन रूपिया दे देतेस।‘

बुधियारिन अपन काम बुता गोबर कचरा में बिपतियाये रहय बुचुआ के गोठ ला सुनिस तहां ले बगिया गे, बंगडी पढे लगिस ‘ का हो हम न तो छठी छेवारी उठायेन न तो कांके पानी पीयेन अउ तूहू मन चह नई पीये अव, फेर काबर मटमटाथौ । का मिल गे राजे बन गे हे त, कोन मार हमर दुख हा कम होगे । उही कमई दू पईली अउ खवई दू पईली ।‘

‘नवां राज म राशन सोसईटी खुले के झन खुले गांव गांव म दारू भट्ठी जरूर खुल गे, जिंहा गांव के जम्मो पईसा सकलाए लागिस, घरो घर म दुख ह अमाय लागिस ।‘

‘रूखमिन के बेटी ला गांव म खुले दारू भट्ठी के संडा मन जनाकारी कर दिस पेट भरा गे अउ संडा मन भगा गे । पुलिस उल्टा रूखमिन के डउका ला ओलिहा दीस ।‘

‘कहां सटक गे रहिस तोर महिमा हा जहां तोर माता के सिरतोन बेटी ला तोर मोसी बडी के बेटा मन थिथोलत रहिन अउ तोरे भाई पुलिस मन रूखमिन ला बीच गांव के गुडी म चकला चलाथर रे छिनार कहिके डंडा म ठठात रहिन ।‘

‘का महिमा गाये, दिया जराये, नवां कुरथा पहिरे ले रूखमिन के दुख हेराही ।‘

‘छोटकी के बाबू नेता मन बर राज बने हे हमर मन बर तो उही काल उही आज । ‘

दुरिहा भांठा म नवां खुले स्कूल ले लईका मन के ‘जय छत्तीसगढ’ ‘जय छत्तीसगढ’ के नारा के आवाज हा बुधियारिन के करलई म तोपा गे ।

छपास ले मन भले भरत होही पेट ह नई भरय

इंटरनेट म हिन्दी अउ छत्तीसगढी के भरमार ल देख के सुकालू दाऊ के मन ह भरभरा गे वोखर बारा बरिस पहिली कोठी म छाबे भरूहा काडी ल गौंटनिन मेंर हेरवाइस, तुरते सियाही घोरे ल कहिस गौंटनिन कहे लागिस का गौंटिया तोर सियाही घोरे के किस्सा तोर बहिनी भाई मन बिक्कट करथे जब तुमन छोट कन रेहेव त हमार सास चोरभठ्ठिन ल बड पदोवव, हंउला हंडा म सियाही घोरे ल कहव उहू ह कम पर जही कहि के रोवव अब फेर मोर मेर घोरवाहू का सियाही ल.

जईसे तईसे सुआंरी के मुह ला बंद करा के लईका के सियाही के बोदल म भरूआ काडी ल बोरिस अउ का लिखव का लिखव कहि के सोंचे लागिस भरूहा काडी के सियाही सुखा गे फेर का के जवाब नई सूझिस.

बारा बछर पहिली के मन भौंरा अब नई नाचे ल करे, रहे सहे लिखे के समरथ ओखर मंत्री कका के समाजवादी सोंच ल बेगारी म टाईप कर कर के अउ अरथ ल गुन गुन के, अपन खातिर कानून के बडका बडका पुस्तक मन ला चांट चांट के चकबका के कुंदरू बन गे हे खाली पक्षकार, आवेदक, अनावेदक, धारा, यह कि .. . के सिवाय अउ कुछू बर दिमाक चलय नही.

थोर बहुत बांचे आशा ल अउ लिखईया मन बर सुकालू दाऊ के हिरदे म बसे सम्मान ल दिल्ली के राजस्थानी एक झिन अडबड बडका हास्य कवि जउन हा सातवां नंबर के अंगरेजी अकछर टीवी म सब झिन ल हंसाथे, तउन ह टोर दिस. उहू काबर कि ओखर एक झिन अउ बडे कवि (वो टीवी में अवईया सबे तुकबंदी करईया मन ह कवि हो जथे अउ कवि मन ह बडे हो जथे पईसा के खेल हे भाई) अरे हां त वोखरो ले बडका कवि के गोड ह सुकालू दाऊ के सियानी म चलत पांच चंदैनी वाले होटल के चिक्कन फर्रश में बिछल के, लचक गे. गलती काखर हे ये मैं नई कहंव फेर सुकालू दाऊ ह तुरते ओला जउन हो सकथे तउन तुरत फुरत डक्टर ल बला के वोखर इलाज करवाईस, वोखर सेवा म अपन जम्मों चाकर मन ल लगा दिस. वो बिचारा सुकालू दाऊ ला अडबड अशिष दीस. सांझ कन मंत्री महोदय के चम्मच के आदेश ले कबि सम्मेलन बर फोकटौंहा म दस ठन दू दू हजार रुपिया दिन के दिहे सुकालू दाऊ के कमरा ले बने खा पी के दिल्ली वाले कबि महराज सुकालू दाऊ ला अइसन चमकायिस कि वोखर पुरखा कबिता वाले मन के तीर म जाना छोड दिही, अईसन विद्रूप अउ शोषण के विरूद्ध बोलईया मन ला तोरे खटिया तोरे बेटिया . . . करत देख के वोखर मन ह भर गे, कि अब नई लिखव सिरतोन में मोर गौंटनिन संही कहिथे नेता ले बडे झुठ्ठल्ला हो गे हें लिखईया मन ह. लिखथे कुछ करथें कुछ. फेर नेट ल देख देख के नवां नवां उदंत भाई मन के, लेख अउ उखर प्रोफाईल म उखर बारे म सूंघे के परयास कर कर के भरम के बादर छटत गिस.

अईसनहे समय म सुकालू दाऊ के मन ह कहिस, बाबू थोरकिन धीर धर ले, पहिली पढे लईक जिनिस मन ला पढ ले, गुन ले, अभी भरूहा कांडी धरईया मन ह का अउ कोन, बिसे में कुरू चारा बांटत हे, तेला पहिली समझ तो ले. फेर लिखे ल धरबे, फेर तोर भरूआ काडी के जमाना तो सिरा गे हे, तईहा के बात ल बईहा लेगे तईसनेहे. जेमा तैं ह लिखना चाहत हस तिहां की बोरड के कलम अउ यूनीकोड के सियाही घोरे ल परही.

अईसे करत करत दिन ह पहाये लागिस अब रोजे सुकालू दाऊ, आफिस म हिन्दी अउ छत्तीसगढी के गियान ल खोजय ओला अपन ताबिज पेन डराईभ म सकेलय अउ घर आके फुरसदिया पढय, अइसे म सुकालू दाऊ ला अढबड बेरा लगय. वोखर गौंटनिन कहय का जी तुहर कम्प्यूटर तो मोर सौत ये, मोर तीर गोठियाय बोले के टेम तुहांर तिर नई ये सिरिफ खटर खटर म लगे रथो अइसनहे अउ दू चार दिन चलही त तुहंर जम्म्मो कहिनी किस्सा गीत ददरिया ल शिवनाथ म सरोये रेहेंव तईसनेहे कम्प्यूटर ल सरो देहूं .सुकालू दाऊ मारे डर के उहू काम ल छोड दिस कम्प्यूटर रहिही तभे, चुपे चाप मोर मानस ह सप सप करत जीयत रहिही.

सुकालू दाऊ अउ वोखर गौंटनिन के लरई ल वोखर परोसी मस्टरिन टूरी ह (जउन ह सुकालू दाऊ के बेटा ला टिउसन पढावय तउन ह) रोज सुनय. एक दिन टीबी वाले बाइ के इस्टाइल म कहिस गौंटनिन तुमन गौंटिया ल जउन काम करत हे तउन ल करे ले मत रोकव, देश हा अडबड उन्नति कर डरे हे गौंटिया के लिखई पढई ल तुमन बंद मत करव. वो ह इंटरनेट म हिन्दी खोजथे वोला खोजन दव. देखव तुहर गुड्डू ह रोज नवां कम्प्यूटर लेहे ल गौंटिया ल कहत हे, फेर तुमन ओला नई दे सकत हव वुही जुन्नटहा मसीन म वो ह गेम खेलत हे, अउ अपन ममा के लेपटाप म अपन नजर गडियाये हे.

हिन्दी अउ छत्तीसगढी म इंटरनेट म अडबड काम होवत थे, ये समझ लेवव कि राहत कार्य खुले हे, काम करे बर सब्बो झिन ल झारा झारा नेउता हे. हमर छत्तीसगढिया भाई इतवारी ह रतलाम ले अउ शुकुल महराज ह अमरिका ले गियान बांटत हे. अउ अडबड झिन हे दाई एक ले बड के एक छत्तीसगढी म परकाश भाई रईपुर ले अउ तुंहर कोरबा वाले पिरिंसपल दीना ममा ससुर के मितान कनहईया तिवारी ह बेलासपुर ले खटर पटर करत हें अउ बलाग लिखईया मन ला ईनाम देवईया हे कोन जाने तोर गौंटिया ल कोनों चिन डारही अउ मोर कपिला भांचा ल कुछुच तो दान दे डारव, अगले जनम ल सुघ्घर करे बर कहि के, इनाम दे डारिस, त तोर गुड्डू बर नवां खेलवना आ जही, अउ तोर गौंटिया के पेपर म नाव तक छपही.

गौंटनिन ह पेपर म नाव छपई के बात ल सुनके जंग हो जथे, देख मस्टरिन येखर नाम ह मोर बिहा के आये के पहिली अडबड छपत रहिसे. ओला देख पढ के मोर बाप ह येखर बर बिहा दिस. फेर येखर छपई ले हमर परिवार के पेट नई भरतिस गांव के गौंटी ल छोड के शहर आ गे हे. इहां अक्केल्ला रहिसे त खर्चा कम रहिस, खाली छपास रोग ल धरे रहिस गांव के धान पान कतका दिन ले पुरही, इंखर बबा मालगुजार रहिस अब कईसे गुजारा चलत हे तउन ला तो तैं ह देखत हस.

अपन मालिक बर काम करे के टेम म कुटूर मुटूर की बोरड अउ कलम ल अपन खातिर चला के नमक हरामी नई करना हे दाई, न तो येखर तिर बिहनिया ९ ले रात कन ९ तक काम के सिवा टेम हे न तो ये हर सरकारी दमांद हे, जउन डिउटी टेम म सेटर गुंथई, चेटिंग करई अउ साहित्य लिखे बर ससुर ह तनखा दे दिही. बडे बडे झंडाबरदार बाना धरईया, अतका किताब, ओतका किताब ये इनाम वो सनमान पवईया मन ह अपन डिअटी टेम म कतको छत्तीसगढ, छत्तीसगढी, हिन्दी, अंतरजाल के सेवा कर लैं अउ वहवाही लूट लैं मोर समझ में ये ह अपन काम ले बेईमानी करे के नवां आदत ल बढावा देना ये.

तेखर सेती दाऊ ला बने मेहनत कर दाउ कहिथौं, छपास ले मन भले भरत होही पेट ह नई भरय अउ रहिस बात ईनाम पाये के, त मोला मोर गौंटिया के मेहनत म भरपूर बिसवास हे, वो ह अपन गियान ला अपन नौकरी धंधा म लगाही त मोर सातो पुरखा ल तार दिही.

गौंटनिन के ये बात ल सुन के मैं अउ मस्टरिन दोनों चुप हो गेन.

संजीव तिवारी

मोर सोंच मोर छत्तीसगढी

छत्तीसगढी भासा बोलैया समझैया मन ला मोर जय जोहार

मोर मन हा छत्तीसगढी बोले पढे लिखे म अडबड गदगद होथे, काबर नई जानव ? फ़ेर सोचथो मोर जनम इहि छत्तिसगढ के कोरा मा होये हवय गाव, गौठन, गाडा रावन के धुर्रा संग खेलत औउ ब्यारा के पैरा मा उलानबादी खेलत लईकई बिते हे सुआ ददरिया फ़ाग अउ माता सेवा गात नाचा गम्मत खेलत पढई के दिन बिते हे तेखरे सेती मोर छत्तिसगढ अंतस ले कुहुक मारथे ।

इहा भिलाई में मोर छत्तीसगढी परेम मा पर्रा डारे ला लागथे काबर कि भेलई तो मोर भारती बुढी दाई के रुप ये, इहा मोर सब्बे २७ मोसी बढी दाई के बेटा मन मिल जुर के रहिथे । उमन ला मोर भासा ला समझे मा थोरिक तकलिभ होथे, तकलिभ होवय के झींन होवह फ़ेर मोर भासा ला सुन के उकर मन मा निपट अनपढ गवांर - अढहा अउ मरहा मनखे के छबि छा जथे अउ उहि छबि जईसे उंखर हमर मन बर ब्यवहार परगट होथे ।तेखर सेती मोला हिंदी बोले ला लागथे, फ़ेर कहां जाही माटी के छाप हा, परगट होइच जाथे । जईसे बिहारी भाई के लाहजा, बंगाली भाई के लहजा हिंदी हर माटी ला बता देथे ।मोर माटी के लहजा वाले हिंदी ले काम चलाथों जईसे कोनो मोर भासा वाले मिलथे छत्तीसगढी में गोठ बात करथों मोर ईहि परेम ला देख के मोर एक बंगाली मितान मोर संग छत्तीसगढी में बेरा कुबेरा बतियाथे, बतियाथे का भईया अईसन कर के वो हा हमर छत्तीसगढीया मन के झुठे छबि मोर जम्मो बाहिर ले आये भईया मन के मन मा बैठे हे वोला सोंच सोंच के अपन अंतस ला जुडवाथे फ़ेर मोला ऐसे जनवाथे की मोर भासा के सम्मान करथे, मैं ओखर संग छत्तीसगढी नई बोलव ? काबर बोलहुं जी मोर भासा ला चिढईया मन संग तो हमन ला अंगरेजी में बोलना चहिये आप मना का सोंचथो मोला लिखव ।

एक बात जौन मोर सियान मन हर हमेशा कहिथे दुसर राज ले आये ईहां के रहैया मन हा अपन घर मा, अपन भासा बोलैया मनखे मन संग, अपनेच भासा में गोठीयाथे फ़ेर हमन अपनो मन संग छत्तीसगढी में गोठीयये में लाज करथन ।मोर एक झन संगी अमरीका मा रहिथे उंहा ले मोला फोन करथे त छत्तीसगढी मा गोठीयाथे कहिथे अडबड मजा आथे ये भासा मा बात कर के ।

मोर संगी जब तैं मोर संग रहत रहे त अपन पापा (ददा) ला फोन करना रहय त मोला बहाना बना के एति वोति भेज देवस काबर कि तोला छत्तीसगढी मे अपन पापा संग बात करना रहय ओखर संग तै हिंदि नई मार सकस अउ मोर आघु मा छत्तीसगढी बोल के अपन आप ला गवनीहा सबित नई कर्ना चाहत रहे । अब कहा ले पलपला गे मोर महतारि के मया हा । शिवनाथ के तीर मे रहि के मछ्ररी के छोठ्का घर अपन बैठ्क् में रखैया भाई तोर गरु गठरी ला बोहे बर महि मिले हव । मोर अईसनहो संगि मन छत्तीसगढी ब्लाग लिखे लागे हें चल भाई तोरो जय होवय थोरिक देरी मा सही मोर छत्तीसगढी के रतिहा पंगपंगईस तो सहीं ।छत्तीसगढी में अउ बहुत कुछ लिखना चाहत हौं आप के अशिश के जरुरत हे ।

संजीव तिवारी

संगी-साथी

ब्‍लॉगर संगी